कविता — “प्रकृति पूछती है”प्रकृति पूछती है..पेड़-पौधों को काटना है क्यों?काटना है तो लगाना ही क्यों?लगाना है तो फिर मिटाना क्यों?अपने ही भविष्य को जलाना क्यों?दिन-प्रतिदिन संकेत दे रही,माँ प्रकृति अब रोती है।मानव अपने स्वार्थ में अंधा,फिर भी आँखें खोती हैं।सूख रहे हैं जल के स्रोत,घटता भूजल हर वर्ष।आने वाली पीढ़ी पूछेगी,क्यों दिया उन्हें यह कष्ट?पिघल रहे हैं हिम के पर्वत,बढ़ता सागर का विस्तार।कितने गाँव, कितने जीवन,होंगे संकट के शिकार।धरती का बढ़ता तापमान,देता हर दिन नई पुकार।आँधी, वर्षा, सूखा, गर्मी,सबका बदल गया व्यवहार।रसायनों से विष बनती है,मिट्टी, अन्न और जलधार।जीवन देने वाली धरती,सह रही विष का भार।जंगल काटे, नदियाँ बाँधी,लालच में खोया इंसान।पैसों की इस अंधी दौड़ में,भूल गया अपना सम्मान।आओ फिर संकल्प करें हम,हर आँगन हरियाली लाएँ।एक पेड़ हम आज लगाएँ,सौ जीवन मुस्काएँ।यही हमारी सच्ची पूजा,यही मानव का हो धर्म।प्रकृति बचेगी, तभी बचेगाधरती का हर एक कर्म।आओ मिलकर प्रण करें।”पेड़ लगाएँ, जल बचाएँ,प्रकृति का सम्मान बढ़ाएँ।धरती माँ का ऋण चुकाएँ,आने वाला कल मुस्काएँ।” 🌿🌍🇮🇳जय हिंद 🇮🇳 लेखक प्रियांशु धारसे पर्यावरणविद् समाजसेवी राष्ट्रीय सैनिक संस्था नर्मदापुरम मध्य प्रदेश।