संविधान के भाग-3 के अनुच्छेद 19(1) में वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सरकार की आलोचना भी शामिल है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि कानून के दायरे में रहकर सरकार की आलोचना की जा सकती है।
कर्नाटक हाइकोर्ट में चल रहे एक मामले में ट्विटर ने सरकार पर ऐसे ऐसे इल्जाम लगाए है कि आपके होश फाख्ता हो जाएंगे। उसका आरोप है कि केंद्र सरकार ने कोविड के दौरान और किसान आंदोलन के दौरान बदइंतजामी को लेकर सवाल उठाने वाले अकॉउंटस को ब्लॉक करने का निर्देश दिया था।
ट्विटर ने कहा है कि जनवरी और जून 2001 के बीच दुनियां भर की सरकारों से कंटेंट हटाने को लेकर आई 1 लाख 8 हजार 8 सौ 77 मांगो में से 43 हजार 3 सौ 87 मांगे सरकार की तरफ से थी जो कंटेंट हटाने को लेकर आई दुनिया भर की मांगो में से चौथे नम्बर की लिस्ट थी।
26 सितम्बर को कर्नाटक हाइ कोर्ट में सुनवाई चल रही थी। इसी सुनवाई पर ट्विटर ने कोर्ट के रेकर्ड पर कहा कि केंद्र सरकार ने राजनैतिक सामग्री के कारण ना केवल उन ट्वीट्स को हटाने को कहा बल्कि यूजर्स के पूरे अकॉन्ट्स को ही ब्लॉक करने दबाव बनाया। ये ना केवल अभिव्यक्ति की आजादी की हत्या है बल्कि कारोबार को भी प्रभावित करने वाला है।
कानूनी खबरों की वेबसाइट बार एन्ड बेंच की एक रिपोर्ट के अनुसार ट्विटर के ऑफिसियल ने कहा कि सरकार की ओर से यूजर के पूरे एकोउन्ट को ब्लॉक करने के लिए कहा गया था जबकि खुद सरकार के बनाये आईटी अधिनियम की धारा 69(A) पूरे एकोउन्ट को ब्लॉक करने की अनुमति नही देती है। यह किसी खास सूचना या खास ट्वीट को ही ब्लॉक करने की अनुमति देता है यानी सरकार अपने ही कानून का मखौल उड़ाकर ट्विटर से गैर कानूनी काम करवाना चाहती है।
ये मामला तूल तब पकड़ा जब ट्विटर से सरकार द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने का मामला बनाते हुए कर्नाटक हाइकोर्ट में याचिका दायर कर दी। बताया गया कि राजनैतिक ट्वीट के कारण कई राजनैतिक एकोउन्ट को ब्लॉक करने के लिए कहा गया जिनमे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा जैसे लोगो का अकॉउंट शामिल था।
यानी मीडिया तो सवाल नही करेगा लेकिन अगर शोसल मीडिया एकाउन्ट के जरिये कोई व्यक्ति अपनी बात रखना चाहे तो सरकारे आपके वजूद को ही मिटा देना चाहती हैं, आपकी प्रोफाइल ब्लॉक करवाने पर आमादा हो जाती हैं।
ये स्थिति चिंताजनक है।
NikhileshMishra
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