दोस्तो कहते है कि देश हो या जंगल दोनो में ही सबसे ताकतवर का ही राज चलता है। चीता तेंदुओं से ज्यादा शक्तिशाली और फुर्तीला होता हैं। 4 सेकंड में 80 किलोमीटर से ज्यादा की स्पीड पकड़ लेता है। 20 सेकंड में अपने शिकार को झपट्टा मारने का माद्दा रखता है। देश की राजनीति में पक्ष और विपक्ष और चीते के झपट्टे और शिकार करने की स्ट्रैट्रजी लगभग एक जैसी ही होती हैं। बस दांव की बात है…वैसे ही अब मध्यप्रदेश के कूनो के इन जंगलो में भी तेंदुओं और चीतों के बीच शिकार को लेकर फाइट होगी। तेंदुआ शिकार को अपने साथ पेड़ पर ले जाकर इत्मिनान से खाता है, लेकिन चीता ऐसा नहीं करता। और राजनीति में सब मिल-बाँटकर खाते हैं। वैसे 2010 में मनमोहन सरकार ने अफ्रीका से चीते लाने प्रस्ताव स्वीकृत किया था। और 25 अप्रैल 2010 को जयराम रमेश अफ्रीका में एमओयू साईन करने वहां गए, चीता को लेकर बात-चीत की 2011 में 50 करोड़ रु. चीता के लिए एलाट कर दिए गए । लेकिन 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी। 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने रोक वापस ले ली,और कोर्ट ने उचित स्थान का चयन करने के लिए सर्वे कमेटी गठित करने के आदेश दिए,सर्वे पूरा हुआ। और आज ग्वालियर से शिवपुरी के बीच फैले 748 वर्ग किलोमीटर के नेशनल पार्क में अब चीते आने वाले हैं।कहा जा रहा हैं कि सन् 1948 के बाद देश में चीते देखे जाने की कोई अधिकारिक सूचना नहीं है।1952 में तो इसे शासकीय तौर पर विलुप्त तथा भारत से इस प्रजाति का खत्म होना मान लिया गया था। देश में इससे पहले आखिरी बार चीते को 1948 में छत्तीसगढ़ की कोरिया रियासत में देखा गया था। यहां के राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव ने बैकुंठपुर से लगे जंगल में तीन चीतों का शिकार किया था। यही देश के आखिरी चीते थे जिन्हे राजा ने 1 ही गोली से मार गिराया था…दिखिए 100 करोड़ रूपये वाले चीतो की भारत में एंट्री….!! एक खास रिपोर्ट। विश्लेषक **सुनील कुमार **
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