आत्माराम त्रिपाठी की✍️से आज यदि देखा जाय की देश की जनता क्या चाहती है उसे क्या मिलना चाहिए और क्य नहीं इससे मतलब ना ही सरकार को है और ना ही विपक्ष को तथा ना ही इनके नुमाइंदों को अब रही बात प्रशासनिक मशीनरी की तो उसकी दशा और दिशा हमेशा उसी तरह की होती है कि” जिसके हाथ में लाठी उसी की भैंस” ठीक उसी प्रकार प्रशासनिक अधिकारियों की भी स्थिति होती है जिसके हाथ में “सत्ता” उसी के अनुसार चलना इनकी भी मजबूरी बन जाती है और हुआ भी ऐसा ही जिसके भी हाथ में सत्ता रही उसी ने इन्हें अपने तरीके से चलाया पर सवाल उठता है की जनता की “परेशानियों” को ना पहले किसी ने समझने की कोशिश की ना ही आज की जा रही है। लोग कभी बाढ़ तो कभी सूखा तो कभी कोविड, कोरोना एवं मंकीपाक्स जैसी जानलेवा संक्रमित विश्वव्यापी बीमारियों से जूझते रहे जिसके चलते स्थानीय स्तर पर गरीबी एवं बेरोजगारी के चलते कोई “पलायन” करता रहा तो कोई इलाज के अभाव में”दम” तोड़ता हुआ नजर आया अब अगर देखा जाये तो स्वास्थ्य सुबिधाओ को लेकर शासन द्वारा “आयुष्मान कार्ड” योजना तो चली किंतु इसमें भी आज 60%लोग बंचित हैं शासन कहता है की हर घर में शौचालय हो किन्तु आज भी हाथ में लोटा लिए खुले मैदान में “बहू” “बेटियों” को बखूबी देखा जा सकता है प्रधानमंत्री आवास योजनांन्तर्गत हर घर पक्का हो ऐसी भारत सरकार की मंशा थी पर आज जिनके पास सामर्थ है उनके घर पक्के किए गए पर जिसके पास कुछ भी नहीं है वह आज भी उसी स्थिति में जी रहा है उसके पास आज भी कोई भी प्रशासनिक योजना नहीं पहुंच पाती! अब बात करें शिक्षा सुधार की तो इसके लिए सरकार ने 0 से ही शिक्षा पर अपना ध्यान केंद्रित किया जिसमें “आंगनबाड़ी केंद्रों” की स्थापना भी हुई किन्तु इसमें तो यहां से लेकर ऊपर तक “भ्रष्टाचार” की कालिख पुत गई जिसमें 80%ऐसेआंगनबाडी केंद्र है जंहा ना केंद्र का पता है और ना ही केंद्र संचालक का फिर भी यहां प्रशासनिक सुविधायें बराबर आ रही है आखिर यह कहां जा रही है किसी को पता नहीं और ना ही कोई भी जिम्मेदार पता करने का प्रयास करता है। अब जैसे किसान को खाद चाहिए सरकार का कहना है की किसानों के लिए खाद को पर्याप्त मात्रा में हर विपणन केंद्र को उपलब्ध कराई जा चुकी है जबकी किसान आज लाइन में खड़ा है तो खाद आखिर कहाँ चली जाती है आखिर कुछ तो गड़बड़झाला है !आज सब्जी के भाव में बेतहाशा वृद्धि हो रही है जो आम जनमानस की थाली से दूर होती जा रही है फिर भी हम बिकास की गंगा बहाने का ढ़िढोरा पीट रहे हैं! अब अगर आवासीय जगहों को देखा जाय तो बजबजाती नालियां गांव हो या शहर “स्वच्छभारत मिशन” के स्वच्छता मिशन की सफलता पर प्रश्न चिन्ह लगा रही हैं! आज जिस तरह शासन द्वारा नदियों के जल को स्वच्छ साफ रखने की मुहिम चलाई गई कितना खर्च हुआ कितना कार्य हुआ या हो रहा है किसी से छिपा नहीं है क्योंकि कल कारखानों का मलवा इन्ही पबित्र नदियों में कहीं ना कहीं से घूम कर आज भी समाहित होता है। आज देखा जाये तो ढेर सारी समस्याएं हैं किन्तु शायद “विपक्ष” इतना “कमजोर” है की वह ज्वलंत मुद्दों के साथ संघर्ष करने से मुंह मोड़ चुका है “मीडिया” अपनी टीआरपी के चक्कर में “सनसनीखेज” खबरों पर अपना फोकस किए हुए हैं सरकार एवं उसकी मशीनरी एक दूसरे के सुर में सुर ताल मिलाते हुए सा रे गा मा पा की धुन में मस्त हैं जनता अपनी भड़ास अपनी की गयी गल्ती पर निकाल कर खामोश हो जा रही है पर शायद यह “खामोशी” “तूफान” का संकेत भी है जिसका खामियाजा शायद आने वाले कल में भुगतना भी पड़ सकता है यह हमारा कहना नहीं बल्कि जनता के बिचारों का आगाज है जिसे हम बयां करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं!
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