मानव सभ्यता में बलिदानियों की अनेकों कहानियाँ हम सभी ने सुनी है। बलिदान या त्याग ही वह युक्ति है जिससे मनुष्य ने इतिहास लिखा है । त्याग करनें को छोटी सी कोशिश ही हर किसी को गौरव से स्वाभिमानी और मेहनती बनाती है ।

इसी त्याग और बलिदान पर ही विश्व में बड़ी बडी ईश्वरीय शक्तियो ने दुनिया को रास्ता दिखाया है और मानवीय सभ्यता का निमार्ण किया है ।

यह मार्ग चाहे सूली पर चढ़ कर जीवन त्याग करनें वाले ईश्वरीय शक्ति यीशु मसीह या सिख धर्म के पाँचवे सच्चे पातशाह गुरु अर्जुन देव साहिब हो। विश्व में मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए प्राणों का बलिदान देने वालो की सूची बहुत लम्बी बन सकती है । यहां यीशू मसीह ने अपने ईश्वरीय शक्ति की चेतना को कायम रखने के लिए सूली पर चढ़ना स्वीकार किया था, वैसे ही गुरु साहिब अर्जुन देव जी ने धर्म के असूलो की खातिर अमानवीय व्यवहार की यातनाओ को साहा परन्तु अपने नियमों को नहीं छोड़ा और वे शाहदत के वो पैमाने स्थापित किए जिन से महान धर्मो के अनुयायी आज भी प्ररेणा लेते हैं ।

विश्व मे धर्म स्थापना के बलिदानो की इसी कड़ी में, धर्म नियम ‘पेड़ो की रक्षा’ करने के लिए भी महाबलिदान की कहानियां भी खून से लिखी गई हैं । गुरु जम्भेश्वर महाराज के बनाये नियम के लिए 363 लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी । आप सुन कर अपने कानों पर यकीन नहीं कर रहे होगे की पेड़ो की रक्षा के लिए कुर्बानी देने वाले लोग भी इस महान भारत की भूमि पर जन्मे थे । ये बच्चे भी थे,उनकी माये भी थी , उनके पिता भी थे।

ये घटना राजस्थान की मारवाड़ की धरती पर सन् 1730 (21सितम्बर ) में घटित हुआ था । परन्तु इतिहास की विडंबना रही की बहुत कम भारतवासी इसे जान पाये । क्यों नहीं जान पाए ? इसके लिए नहीं जान पाए क्योंकि इतिहासकार उनके साथ नहीं थे । परंतु आज का जो पर्यावरण असंतुलन के दौर में इतनी बड़ी प्रेरणादायक घटना कोई ओर नहीं हो सकती ।

अब समय है पेड़ों के लिए जान देने वाले बलिदानियों का इतिहास आप सभी को स्मरण हो और पर्यावरण संरक्षण में प्रेरणादायी इस कहानी को हस सभी को बता सकें।

बात सन् 1730 के सितम्बर महीने की है । तत्कालीन मारवाड़ राज्य के ( वर्तमान जोधपुर ) के राजा अभय सिंह के राज्य काल में महल के निर्माण के लिए चुने की भट्टी को जलाने के लिए लकड़ियों की आवश्यकता थी। राज्य के दीवान गिरधरदास भंडारी के आदेशानुसार लकड़ियों का प्रबंध ‘खेजड़ी’ बाहुल्य गांव खेजड़ली से किया जाना निश्चित हुआ। राज्य के कर्मचारी जब गांव में पहुंचे तो गांव के लोग इस कार्य के विरोध है हेतु लामबंद हुए। उन्होंने अपने बिश्नोई धर्म के नियम ‘रूख लीलो नहीं धावे’ स्मरण करवाते हुए राज्य कर्मचारियों को हरे वृक्ष को ने काटने की गुजारिश की। परंतु राज्य के दीवान ने उनकी एक नहीं सुनी । तब आसपास के 84 गांव के सभी बंधु एकत्रित हुए और उन्होंने एक बार फिर से दीवान गिरधर दास भंडारी से अनुरोध किया की हरे वृक्ष को बचाना उनका नियम है इसलिए वह इन पेड़ों को न काटें । परंतु अहम पर सवार दीवान को कोई असर नहीं हुआ । और उन्होंने वृक्षों को काटने की आज्ञा दी। इस हुक्म पर सभी बंधुओं ने विचार किया कि अब हमें हरे वृक्ष के कटने पर अपने प्राणों की आहुति देनी होगी । सर्वप्रथम अमृता देवी बेनीवाल सामने आई और पुकारा कि ‘सिर सांठे रुँख रहे , तो भी सस्ता जाण’ अर्थात यदि एक सिर के बलिदान होने पर भी एक पेड़ बचता है तो भी वह सस्ता है। और इसके बाद वह पेड़ से लिपट गई और राज्य कर्मचारियों को उसके ऊपर ही प्रहार करने को कहा । अमृता देवी के साथ उनकी तीन छोटी बेटियां आशु, रतनी, भागू भी पेड़ों से लिपट गई और खुद को बलिदान कर दिया। इस घटना का पता जब आसपास के गांवों तक पहुंचा तब आस पास के 84 गांव के लोगों ने एकत्रित होकर के निर्णय लिया कि जैसे-जैसे एक पेड़ को काटा जाएगा एक एक बंधु अपने प्राण न्योछावर करेगा । इस प्रकार यह बहुत ही अचंभित व अविश्वसनीय घटनाक्रम रहा जो काफी दिन तक चलता रहा । जब तक यह खबर राजा तक पहुंचती और वह इसे रुकवाने का आदेश देते तब तक 363 पुरुष ,स्त्री और बच्चे अपने प्राण बलिदान कर चुके थे । जिसमें 292 पुरुष और 71 महिलाएं थे । अंततः राजा उभय सिंह ने इस घटना पर दुख प्रकट किया और ताम्र पत्र पर माफी नामा लिखा । और आदेश दिया इन बिश्नोई बाहुल्य गांव में कोई भी हरे खेजड़ी को नहीं काटेंगे । जो कि आज भी लागू है। क्योंकि यह राजस्थान का राजकीय वृक्ष है । जब हम इस घटना को याद करते हुए अपने मन में दृृश्य की कल्पना करते हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं । ऐसे महबलिदानियों को याद करना , उन्हें नमन करना उनकी स्मृति को बनाए रखना हम सभी के लिए प्रेरणादाई है। विश्व के लोग जब इस भारतीय घटना के बारे में सुनते हैं तो वे अचंभित होते हैं, कि वृक्षों के लिए भी कोई जान दे सकता है। अमृता देवी सहित 363 लोगों की याद में भारत सरकार द्वारा भी पर्यावरण संरक्षण हेतु पुरस्कार दिया जाता है। उन महाबलदानियो को कोटि-कोटि नमन करते हुए आओ हम एक मुहिम का हिस्सा बने कि पर्यावरण सरंक्षण का पाठ सिखाने वाली इस महाबलिदान की घटना को सभी के सामने प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत करेंगे। और मेरा आप सभी देशवासियों से विनम्र निवेदन है की इस घटना पर शहीद हुए 363 पर्यावरण योद्धाओं की याद में एक पौधारोपण अवश्य करें शायद यह पौधा रोपण कौन 363 शहीदों के लिए श्रद्धांजलि के रूप में होगा

अनुराग विशनोई पर्यावरण योद्धा जंगल बचाओ पर्यावरण बचाओ राष्ट्रीय सह संयोजक

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