देश में 18जुलाई से जीएसटी की नई दरें लागू कर दी गई हैं नई दरों का सर्वाधिक खामियाजा गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। वित्त मंत्री मैडम निर्मला से अब देश की त्राहिमाम करती जनता गुहार लगा रही है कि 18 जुलाई से आपने हर घर के किचन पर जो ₹500 प्रति माह का बोझ डाला है कृपया वह एम करके उसे वापस ले लो। लेकिन सबका साथ सबका विकास या विनाश करने वाली सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। विपक्षी दलों की आवाज भी नक्कारखाने में तूती की तरह हो गई है संसद से लेकर सड़क तक वह चीख चिल्ला रहे हैं जगह-जगह विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन सरकार उसकी भी नहीं सुन रही है वह तो आम जनता को राहत देने के बजाय झटके पर झटके दे रही है दही पनीर आटा चावल गेहूं दालों से लेकर रोजमर्रा की चीजें अब जीएसटी के दायरे में आ गई हैं। इससे हर घर के किचन रसोई का बजट बिगड़ गया है। यही नहीं अब जो कफन पर भी टैक्स लगा दिया गया है यानी इस देश में जीना तो जीना मरना भी महंगा हो गया है। दरअसल पैकेट बंद आटा चावल दही दूध लस्सी जैसे खाद्य पदार्थों को जीएसटी के दायरे में लाने के बाद इन तमाम उत्पादों के दाम बढ़ गए हैं।अबे महंगाई के मापक कहे जाने वाले उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और थोक मूल्य सूचकांक में जीएसटी का तीसरा मापक भी जोड़ना चाहिए ताकि इससे यह पता चले कि जीएसटी के कारण कितनी महंगाई बढ़ी है। क्योंकि अब जीएसटी के दायरे में गेहूं धान राई बाली और से ही नहीं बल्कि लस्सी दही छाछ पनीर जैसे तमाम उत्पाद आ गए हैं इसलिए हर उपभोक्ता के खासकर गरीब व मध्यम वर्ग के घर का बजट बिगड़ गया है वैसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण नेदोबारा यह घोषणा करके लोगों के जख्मों पर मरहम लगाया है कि खुले बेचे जाने वाले किसी भी पदार्थ या वस्तु पर जीएसटी नहीं लगेगी। मसलन दूध दही छाछ धान चावल इतिहास लेकिन पैकेट बंद पदार्थों पर यह टेक्स लगेगा ही। हैरानी की बात यहां यह है कि जब 5 साल पहले जीएसटी प्रणाली को अस्तित्व में लाया गया था तब उसका गुणगान करते हुए हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया था कि जीवन आवश्यक वस्तुओं पर जीएसटी नहीं लगेगी। 18 जुलाई तक रसोई के उपाध्यक्ष श्री ही थे मगर अब उन पर 5% जीएसटी लगा दी गई है। यह सरकार की मनमानी नहीं तो और क्या है ?यहां बताना जरूरी है कि 3 साल पहले इसी सरकार ने अचानक देश के उद्योगपतियों का कारपोरेट टैक्स कम कर दिया था तब से हर साल सरकार के खजाने को डेढ़ लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है यानी अन्य उद्योगपतियों को 4:30 लाख करोड़ रुपए की छूट की खैरात बांट रही है सरकार मगर गरीब जनता के दूध दही चावल आटे पर जीएसटी लगाकर उन्हें ही चल रही है। मतलब यही है कि अमीर उद्योगपतियों को राहत और गरीबों की रसोई पर आवत वाह रे सरकार। मोदी सरकार ने केवल जीवनावश्यक वस्तुओं पर ही जीएसटी नहीं लगाया बल्कि पैकेट बंद मछलियां शस्त्रक्रिया के उपकरणहॉस्पिटल में ₹5000 से अधिक के रूम किराए होटलों में ₹1000 से अधिक के रूम किराए पर भी 530 जी जीएसटी लगा दी है। वहीं छात्रों की पेंसिल शार्पनर रबर पेंट बैंक की चेक बुक मकान के किराए छपाई की स्याही से लेकर एलइडी लैंप बल्ब तक कई वस्तुओं पर जीएसटी को 12% से बढ़ाकर 18 फ़ीसदी कर दिया गया है। इतना ही नहीं सोलर वाटर हीटर सड़कें पुल रेलवे मेट्रो की यंत्र सामग्री मसाले का पासबुक काफी आज जीएसटी के दायरे में आ गई है।सबसे बड़ी और शर्मनाक बात तो यह है कि शमशान में लगने वाले अंतिम संस्कार की सामग्री पर भी अब 12प्रतिश के बजाय 18 फ़ीसदी जीएसटी वसूली जाएगी।क्या यह मौत की चौखट पर मोदी सरकार द्वारा की जाने वाली कर वसूली नहीं है? मतलब इस देश में जीना तो मुश्किल है ही अब मौत भी काफी महंगी हो चुकी है सत्ता की मलाई खाने वालों ने सब कुछ महंगा और आदमी सस्ता कर दिया है। इस तरह आर्थिक मोर्चे पर नाकाम सिद्ध हो रही केंद्र सरकार ने अपनी काली तिजोरी भरने के लिए जीएसटी के माध्यम से जो दमनकारी वसूली शुरू की है उसकी तुलना कई पुराने लोग मुगलकालीन जजिया कर से कर रहे हैं। खास बात यह है कि पहले एक कहावत थी गरीबी में आटा गीला जो अपने आप में बहुत मशहूर थी पर अब इसे जीएसटी में आटा गीला बोलना चाहिए क्योंकि हमारी सरकार ने होटलों में खाने वाले गरमा गरम पराठे पर भी 18% जीएसटी लगा दी है जाहिर है परांठे पर जीएसटी तो आते पर भी जीएसटी है और तो और पवन ऊर्जा सौर ऊर्जा से चलने वाली आटा चक्की पर भी जीएसटी की दर 5% से बढ़ाकर 18% कर दी गई है अब आपकी हमारी कमाई कितनी घटी है और तरह तरह के टैक्स कितने बड़े हैं इन सब पर सोचने का वक्त ही किसी को नहीं मिलेगा क्योंकि देश में एक नया अभियान आ रहा है पहले घर घर मोदी अभियान चला था अब चारा से 15 अगस्त तक हर घर तिरंगा अभियान चलाया जाने वाला है यानी देशभक्त बहुत जरूरी है महंगाई का विरोध जाए भाड़ में वंदे मातरम् भारत माता की जय।
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