हसदेव #बचाओ -हसदेव जंगल छत्तीसगढ़ के उत्तरी कोरबा, दक्षिणी सरगुजा और सूरजपुर जिले के बीच में स्थित है. लगभग 1,70,000 हेक्टेयर में फैला यह जंगल अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता है. #वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की साल 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, हसदेव अरण्य गोंड, लोहार और ओरांव जैसी #आदिवासी जातियों के 10 हजार लोगों का घर है. यहां 82 तरह के पक्षी, दुर्लभ प्रजाति की तितलियां और 167 प्रकार की #वनस्पतियां पाई जाती हैं. इनमें से 18 वनस्पतियों खतरे में है.छत्तीसगढ़ की मौजूदा सरकार का फैसला जिसमें 6 अप्रैल 2022 को एक प्रस्ताव को मंजूरी दी . इसके तहत, हसदेव क्षेत्र में स्थित परसा कोल ब्लॉक परसा ईस्ट और केते बासन कोल ब्लॉक का विस्तार होगा. इस विस्तार का सीधा अर्थ है जंगलों की कटाई. सरकारी आंकड़े के अनुसार लगभग 95 हजार पेड़ और विरोध कर रहे लोगों के अनुसार लगभग 2 लाख पेड़ों के कटाई की तैयारी है.

स्थानीय समुदाय पेड़ से लिपटकर ‘चिपको आंदोलन’ के तर्ज पर पेड़ों को बचाने में लगा है तो कोई दस साल से विरोध प्रदर्शन कर इसका विरोध कर रहा है. छत्तीसगढ़ में घने जंगलों वाले इलाके में कोयले की खदानों का विस्तार किए जाने की वजह से स्थानीय लोग विरोध पर उतर आए हैं.छत्तीसगढ़ और सूरजपुर जिले में परसा कोयला खदान का इलाका 1252.447 हेक्टेयर का है. इसमें से 841.538 हेक्टेयर जंगल में है. यह खदान राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित है. राजस्थान की सरकार ने अडानी ग्रुप से करार करते हुए खदान का काम उसके हवाले कर दिया है. मतलब इस जगह अडाणी ग्रुप खनन करेगा.

छत्तीसगढ़ पर कई राज्य खनिज दृष्टि से निर्भर है यहां से बिजली कोयला लोहा एल्यूमीनियम टिन जैसे खनिज पूरे भारत में सप्लाई होते है लोहा तो जापान तक निर्यात होता है छत्तीसगढ़ की जमीन खनिज और जंगल के लिए जानी जाती है यह एक मात्र राज्य है जहां खनिज की कोई कमी नहीं राज्य के आय का महत्वपूर्ण हिस्सा खनिज से प्राप्त होता है किन्तु इसका यह भी प्रयास होना जरूरी है कि हम जंगलों को खत्म न करे जंगल है तो हम है ।

आदिवासियों के मुताबिक, पंचायत एक्सटेंशन ऑन शेड्यूल्ड एरिया (पेसा) कानून 1996 के तहत बिना उनकी मर्जी के उनकी जमीन पर खनन नहीं किया जा सकता. पेसा कानून के मुताबिक, खनन के लिए पंचायतों की मंजूरी ज़रूरी है. आरोप है कि इस प्रोजेक्ट के लिए जो मंजूरी ली ही नहीं गयी जो कागज दिखाया जा रहा है वो फर्जी है. आदिवासियों का कहना है 700 लोगों को उनके घरों से विस्थापित किया जाएगा और 840 हेक्टेयर घना जंगल नष्ट होगा.केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ के घने हसदेव अरंड जंगलों में परसा में ओपन कास्ट कोयला खनन के लिए पर्यावरण मंजूरी दे दी है।ओपन कास्ट माइनिंग में क्षेत्र से सभी वनस्पति और मिट्टी को हटाने के बाद कोयले की खुदाई शामिल है ।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2 जनवरी 2018 को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आदेशित भारतीय वन्यजीव संस्थान व भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद द्वारा हसदेव पर किए गए अध्ययन की रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि देश के केवल 1 फीसदी हाथी छत्तीसगढ़ में हैं लेकिन देश में मानव-हाथी संघर्ष की 15 फीसदी से अधिक घटनाएं यहां दर्ज की गई हैं. ऐसे में अगर नए कोयला खदान को मंजूरी दी गई तो हाथी-मानव संघर्ष की स्थिति को संभालना असंभव होगा.

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय का मुख्य दायित्व पर्यावरण को बचाने का होना चाहिए न कि ऐसा करने का की जंगल काटो और अपने मतलब के लिए कोयला निकालो और पर्यावरण को बचाने के बजाय इसकी नीलामी करो बचाने के बजाय इसे बेचो ! ऐसे वचन फिर बेईमानी है इस मंत्रालय के लिए और ये स्वयं अपने बनाए नारे की “पर्यावरण बचाओ” ,”पेड़ है तो हम है” आदि का पालन नहीं कर रहे । पर्यावरण पर निबन्ध प्रतियोगिता आयोजित करना ही उचित नहीं जब स्वयं देश का राष्ट्रीय पर्यावरण मंत्रालय स्वयं प्रकृति की सुरक्षा न करके खनिज प्राप्त करने पर ध्यान दे रहा है ।

सबसे बड़ा सवाल तो खुद से है की मनुष्यो कब तक प्रकृति से लूटोगे ये खनिज ? कब तक काटोगे ये जंगल ?? कब तक प्रकृति को मारोगे??? वैसे प्रकृति को मनुष्य ने दिया तो कुछ नहीं और कभी दे भी नहीं सकता एक पौधा तक नहीं लगाता है अपने जीवन में .. घर को सजाने गुलाब का पौधा लगायेगा जरूर लेकिन दुनिया को सजाने के लिए ऐसे पेड़ नहीं लगायेगा जिससे वह खुद जीवित है मनुष्य तो अपने मतलब के लिए प्रकृति सम्पदा को लूटता रहता है जब तक दुनिया नष्ट न हो जाए ये लूटते ही रहेंगे ईश्वर की बनाई ये दुनिया मनुष्य ही नष्ट करेगा।

अनुराग विश्नोई राष्ट्रीय जंगल एवं प्रकृति बचाओ अभियान भारत

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