![]आत्माराम त्रिपाठी की✍️से
पुरूष और नारी यानी शिव शक्ति दोनों एक-दूसरे के पूरक मानक गये है किन्तु इस सब्द को आज के सभ्य समाज ने अलग अलग तरीके से कहिए या फिर अपने अपने नजरिए से देखा उसे परिभाषित किया उसका विश्लेषण किया। किसी ने नारी को अबला निसहाय बताया तो किसी ने पुरुष प्रधान समाज में पुरुषो के नजरिए में दोष देखा नारी को उपभोग की वस्तु माना किंतु इसी पुरुष प्रधान समाज ने नारी को सशक्त माना इसी पुरुष प्रधान ने समाज ने उसे मां बहन बेटी और शक्ति शक्ती की उपाधि भी दी और वह भी आत्मा की आवाज से आत्मा की गहराईयों से अपने उद्बोधन को मान्यता दी। किसी ने उसे काली, सरास्वती, दुर्गा के नाम से पुकारा तो किसी ने लक्ष्मीनरायण , शिव शक्ति शंकर पार्वती के नाम से पुकारा और उसके मान को बढ़ावा दिया उसकी सक्ती का एहसास कराया ।यह पुरूष ही जो भाई बनकर उसकी आजीवन उसके मान सम्मान के रक्षा का वचन देता है कलाई में बंधे धागे के बदले अपने प्राणों की आहुति देने में भी पीछे नहीं हटता वहीं पुरुष पिता बन उसको सरछण प्रदान करता है सो ऐसे कई रिस्ते होते हैं जो नारी के सम्मान की रक्षा के प्रति जागरूक सजग रहते हैं। किंतु जब किसी रिश्ते के बिना भी एक पुरुष के अंदर राह चलती लड़की युवती के प्रति की उसका उपहास न हो वह चिंता करें वह भी बिना किसी रिश्ते बिना किसी पहचान के तो बड़ी बात हो जाती है और मन ऐसे व्यक्ति को हृदय से सल्यूट सलाम करने को कहता है।आज यह वाकया एक महिला पत्रकार के साथ घटी वह एक समाचार कवरेज कर रही थी स्थान था बांदा जनपद का जिला अधिकारी कार्यालय कि एक सभ्य पुरुष की नजर उस महिला की तरफ घूमी तो वह देखता है कि वह महिला स्त्रीधर्म से पीड़ित हैं लेकिन वह इससे बेखबर है तो वह सभ्य पुरुष निश्चल भावनाओं के साथ आगे बढ़ता है और कहता है बेटी तुम्हारे पैंट फट गई है तुम घर जाओ उसके इस छोटे से वाक्य से वह पत्रकार महिला सोच में पड़ जाती है कि अरे यह क्या पैंट तो मैंने पहना नहीं फिर भी यह मेरे पैंट की तरफ इशारा कर रहा है वह भी बड़ी गंभीरता से पहले तो उसने इसे हल्के से लिया पर उसकी बात की गंभीरता को नजरंदाज नहीं कर सकी नजदीकी बाथरूम में चली गई तो वहां उसे पुरुष के कहने समझाने का अर्थ मालुम हो गया उसे पता चला की वह पिन से है और मर्यादा वस्र रहित है सो वह उस व्यक्ति को मन ही मन धन्यवाद दिया उसकी सोच को प्रणाम किया की उसने उसे समाज में रूसवाई होने से बचा लिया और अब वह उसके विचारों से इस कदर प्रभावित हुई की जिला अधिकारी बांदा से मिल उस पुरुष को सम्मानित करवाने तक के लिए बिचार करने लगी । मैं खुद इस युवती को अपनी छोटी बहन मानता हूं और इसने जब मुझे यह सब बताया तो मैंने उसे धैर्य पूर्वक सुना उसके कोमल भावनाओं को समझा और फिर अपने आप को रोक नहीं पाया कलम उठा यह चंद लाइनें लिख दिया उस व्यक्ति के संम्मान में जिसका आज के युग में जंहा नित्य चीरहरण हो रहे हों वहां ऐसे भी व्यक्ति मौजूद है जो नारी शक्ति के सम्मान के प्रति जागरूक हैं सचेत हैं।
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