धरती का दिल रंगा

कुदरत ने हरियाली के रंग से । पेड़ पौधे,वृक्ष लताएं पशु और पंक्षी हैं इसकी गोद में पलती बढ़ती कई पीढ़ियों की अनगिनत कलाए ।। नदियां,झरना का कल कल करता पानी कहता हैं ऐ,मानव ! मुझसे ही हैं तेरी ज़िंदगी की रवानी ।। कली का फूल बनना और उससे फिर, हर एक का जीवन खिलना दर्शाती हैं धरा की जादू भरी अदाएं ।। धरा का हर एक रंग हैं अनोखा आश्चर्यचकित और मदहोश करने वाला धरा पर आज हैं संकट गहराया क्यूं,आखिर ! धरती मां का आंचल हैं तेज तपिश से झुलसाया पेड़ पौधों की टूटती श्रृंखला को हैं एक मजबूत कड़ी में बदलना । धरती मां के आंचल को फिर से एक बार हरे रंग से हैं रंगना ।। वायु को शुद्ध कर प्राण वायु को जीवन दान हैं देना ।। सहेजना हैं हरियाली को और धरती की झुलसे भाग को हरित भाग में हैं परिवर्तित हैं करना ।। हरित प्रणाम

![]स्नेहा कृति (रचनाकर, पर्यावरण प्रेमी और राष्टीय सह संयोजक) कानपुर उत्तर प्रदेश

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