प्राकृतिक संरचना यूं ही नही बनी ऊंचे ऊंचे पहाड़ उस पर बर्फ का गिरना और जम कर धीरे धीरे पिघलना। उसका पानी जंगल से छन छन कर होता हुआ नदियों के रूप में सबको मीठा जल देते इठलाते नमकीन पानी बन समुद्र में विलीन हो जाना सब प्रकृति का खेल है। आज तक इंसान इस चक्र को समझ नही पाया पर प्रकृति से खिलवाड़ कर अपना जीवन जोखिम में डाल दिया ।

जंगल जंगल घूमता हूं मैं,

ढूंढने को प्रेम की निशानियां । और पर्वत पर्वत चढ़ के जाता हूं मैं ! खोजने कुछ अंश मोहब्बत के जो, नामे वफ़ा हैं कुदरत के ।। ये,खूबसूरत से पर्वत और पहाड़ की कहानी अधूरी सी साथ बिन कुदरत के, पर्वत की चोटी की ऊंचाई से देखो, या देखो, जंगल की आश्चर्जनक कर देने वाली गहराइयों से दोनो ही,एक दूसरे के पूरक से लगते हैं । जैसे,इन दोनों का नाता रिश्ता कुछ मंझा और थोड़ा सदियों पुराना सा लगता हैं ।। कुदरत हैं कड़ी इन दोनों को बांधने की, बिन कुदरत मानो, इनका ये संबंध बेमतलब और बेमानी सा लगता हैं ।।

![]स्नेहा कृति 🙏❤️🙏❤️🙏❤️🙏❤️🙏❤️ (रचनाकर, पर्यावरण प्रेमी और राष्टीय सह संयोजक) कानपुर उत्तर प्रदेश

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