नई दिल्ली (इंट) भरती के बात 2,000 वर्षों के इतिहास की तुलना में अब नापें तो कुछ सालों में पृथ्वी का तापमान बेहद तेजी से बढ़ रहा है। कई दशकों से लगातार वैज्ञानिक बता रहे हैं कि जीवाश्म ईंधन के जलने से ग्लोबल वार्मिंग की आग तेजी से धरती धधक रही है। तमाम वैज्ञानिक प्रमाणों के बावजूद जीवाश्म बंधन का इस्तेमाल दुनिया से खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। जीवाश्म ईंधन खत्म होगा तो दूर इसको कम करने के भी आसार साफ नहीं नजर आ रहे है। संयुक्त राष्ट्र संस्था आई.पी.सी. सी. की ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी कि धरती

बच पाएगी धरती? लील रहा है ग्लोबल वार्मिंग 8 दुनिया के पास बचे हैं सिर्फ 8 साल, कहां खड़ा है भारत ? इसका एक ही विकल्प वनिय यानी जंगलात को संरक्षित कर उनका विस्तार करना पड़ेगा धरती को ठंडा रखने के लिए ।

• जीवाश्म ईंधन के जलने से ग्लोबल वार्मिंग की आग तेजी से धधक रही

सबसे अमीर देश ही अकेले कुल उत्सर्जन के आधे के लिए जिम्मेदार

आई. पी. सी. सी. ने चेतावनी दी है कि भरती के तापमान वृद्धि को डेढ़ डिग्री तक रोकने के लिए कार्बन उत्सर्जन में 43% की कटौती करनी होगी। साल 2010-2019 में दुनिया का असत वार्षिक ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन, मानव इतिहास में सबसे उच्चतम स्तर पर था। ऐसे में जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली।

ग्लोबल वार्मिग को रोकने के लिए हमें अपने उत्सर्जन को जीरो पर लाना होगा। इस काम के लिए ऊर्जा क्षेत्र में बड़े बदलाव की आवश्यकता है और जीवाश्म ईंधन के उपयोग में भारी कमी लानी होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि अक्षय ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर और पवन ऊर्जा, साथ ही पावर बैंक स्टोरेज बैटरी की लागत में भारी गिरावट आई है। इससे वह लगभग गैस और कोयले के बराबर और कुछ मामलों में सस्ते) हो गए. हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2010 के बाद से को बचाने के लिए अब सिर्फ 18 साल ही बचे हैं। अंतर सरकारी समिति उदासीनता के चलते जलवायु परिवर्तन के संचालन के लिए अपनो 4 अप्रैल 2022 को जारी रिपोर्ट में चेताया गया  है।

इसमें कहा गया है कि अगले 8 सालों में यानी 2030 तक दुनिया अगर अपने उत्सर्जन में कटौती को आधा यानी 50% कम नहीं करती है तो साल 2050 त जीरो यानी अपने उत्सर्जन स्तर को शून्च पर लाना होगा। दशक में घटी है। (आई.पी.सी.सी.) ने. इसी

लागत में 85% तक की निरंतर गई है। ग्लोबल सीओ2 उत्सर्जन बढ़ने की रफ्तार कम हुई है पर उत्सर्जन अथ भी 54 प्रतिशत अधिक है। वास्तविकता यह है कि दुनिया के सबसे अमीर देश ही अकले विश्य के कुल उत्सर्जन के आवे के लिए जिम्मदार है, जबकि दुनिया के सबसे गरीब देशी का हिस्सा सिर्फ 12% है। कर्तमान में हम दर्मिंग को 1.5 डिग्री सैल्सियस या 2 डिग्री सैल्सियस तक भी सीमित करने से बहुत दूर हैं।

अगर ऐसा नहीं किया तो उसे तबाह होने से कोई नहीं रोक सकता है। आई.पी.सी.सी की रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2019 में 1990 के मुकाबले 51 प्रतिशत अधिक फार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन हुआ, लेकिन उत्सर्जन को दर पिछले एक

● भारत मोटे तौर पर ग्रीन हाऊस गैस के कुल वैश्विक उत्सर्जन में से 6.8 फीसदी

ग्लोबल वार्मिंग में देखे कहां खड़ा है भारत कितने प्रतिशत का हिस्सेदार है। 1990 से 2018 के बीच भारत के ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन मे 172 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है

2013 से 2018 के बीच देश में प्रतिष्यक्ति उत्सर्जन भी 17 फीसदी से ज्यादा है।

“अभी भी भारत या उत्सर्जन स्वर जी 20 देशों के अंसत स्तर से बहुत नीचे है

● भारत की कुल ऊर्जा आपूर्ति में जीवाश्म ईंधन आधारित प्लोट्स का योगदान 74 प्रतिशत है

● भारत में अक्षय ऊर्जा की हिस्टेदारी 11 फीसदी है

पेड़ लगाओ पेड़ बचाओ

पीपल नीम तुलसी अभियान रजिस्टर्ड Dr Dharmendra Kumar संस्थापक

Tagged in : #birds#environment #CMUK #CMUP #crime #police #forest #human #journalist

Categorized in : All News दुनिया देश स्पेशल