आत्माराम त्रिपाठी लेखक पत्रकार
लखनऊ सीधी में आक्रामकता की हदें पार करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धाराओं में हो मामला दर्ज हो विंध्यप्रदेश का भाषाई चैनल चलाने वाले कनिष्क तिवारी पर पुलिस की आक्रामकता की हदें यह सोचने के लिए मजबूर करती है वह कौन सी शक्तियां है जिनके इशारे पर इतने बड़े षड्यंत्र की कार्ययोजना पुलिस को बनानी पड़ी अभिव्यक्ति की आजादी के दम पर स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखा हुआ है।पुलिस के सामने प्रदर्शन करना कोई अपराध थोड़ी ना है, जन आंदोलन करना अगर अपराध ही होता तो शहीदे आजम भगत सिंह जैसों के दम पर हम आजादी नही पा जाते।आंदोलनों, प्रदर्शनों को दबाना प्रजातंत्र का गला घोटने के बराबर है।कनिष्क तिवारी एवं साथियों पर जिस प्रकार से पुलिस ने बर्ताव किया है वह सिर्फ शर्मनाक ही नहीं वैश्विक स्तर पर हमारे देश की आन बान शान पर प्रश्नचिन्ह भी लगाता है।विंध्य के भाषाई चैनल पर नकारात्मक विचारधारा के लोगों द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार एवं पत्रकारिता के मान्य सैद्धांतिक नियमों के विपरीत आचरण की प्रवृत्ति भी महसूस होती है। इस पूरे घटनाक्रम में निलंबन पर्याप्त कार्यवाही नहीं है, इसमें यह जानना भी आवश्यक है कि कनिष्क तिवारी एवं साथियों को मानसिक, शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने के पीछे और किन किन लोगों के हाथ है।किन शक्तियों का दिशा निर्देशन इसमें चला है उन्हें चिन्हित कर सभी पर भारतीय दंड विधान की धाराओं के तहत मामले दर्ज किए जाएं और कनिष्क तिवारी के परिवार के साथ पुनः कोई घटना ना हो इस दिशा मे शासन स्तर पर उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाये । आज यह पहली घटना नहीं है पत्रकारों के साथ देश का चाहे जो कोना हो काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पत्रकारों का उत्पीड़न हुआ और हो रहा है उनकी कलम से निकलने वाले सत्य को हजम करने की शक्ति न जनप्रतिनिधियों में बची नहीं नौकरशाही में हमेशा उस कलम को कुचलने का कार्य किया जो इनके चेहरे को बेनकाब किया और आज भी कर रहे हैं। पत्रकार अपने साथियों की सुरक्षा को लेकर बंटा हुआ है प्रिंटमीडिया इलक्ट्रानिक मीडिया पोर्टल ब्लागर के नाम पर बिभिन्न संगठनों के नाम पर छोटा बड़ा के नाम पर मान्यता प्राप्त गैर मान्यता प्राप्त के नाम पर। आज इस पत्रकारिता के पबित्र मिशन को कुछ लोगों ने कंलकित कर दिया है इसे व्यवसाय का जरिया बना दिया है दबे कुचले मजलूमों की आवाज बनने की जगह पुराने जमाने के राजा महाराजाओं के दरबार में बिरदावली गाने वाले भाट बनगये है गुडगान करने वाले चापलूस जयचंद बन गये जिसका खामियाजा संपूर्ण प्रेस जगत को भुगतना पड़ रहा है। समय आ गया है इनके गुणगान बंद करो दबे कुचलो की आवाज बनो और उस समय को याद करो जब पत्रकार को बेतन के नाम पर लाठी, काले पानी की सजा फांसी की सजा मिल सकती है। एक दिन नहीं कयी दिन भूखे रहकर समाचार लिखना पड़ेगा लेकिन आजादी के इन मतवालों ने उस बेतन को स्वीकार कर पत्रकारिता की है और यह सब भुगता है किन्तु कलम की धार को कुंद नहीं होने दिया हो सकता है। मेरे कुछ साथियों को मेरे कथन पर भरोसा नहीं हो तो वह सर्च करें आजादी के पहले पेपर बंगाल गजट का जो गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए श्याही की जगह अपने खून से लिखते थे। किंतु कलम की धार को कुंद नहीं होने दिया देश में क्रांति ला दी और हम आज इन भ्रष्टाचारियो के एक मामूली कड़ी से घबडा अपने उन पुरोधाओं के त्याग तपस्या बलिदानियों के बलिदान को ही भुला बैठे धिक्कार है हमपर हमारी पत्रकारिता पर आगे बढ़ो हर जोर जुलुम के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है। सो आगे बढ़ो कलम उठाओ और चुन चुनकर इनके चेहरे पर पड़े पर्दो को अपनी नुकीली कलम से नोच डालो। यह कितनों का चीरहरण करेंगे कितने को जेल में डालेंगे कितनों को कुचलेंगे पर हम अडिग है यह सब बर्दाश्त करेंगे किंतु शपथ ले की झुकेंगे नहीं जय हिन्द जय भारत वंदेमातरम।
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