गौरैया एक छोटे पंछियों की प्रजाति है जो ज्यादातर चहल पहल और जीवांत माहौल में पाई जाती है । इस पक्षी को जहां इंसान होता है उसके आसपास ही पाया जाता क्यों भोजन इनको बिना ज्यादा प्रयास के मिल जाता है और घोंसला भी बहुत सुरक्षित स्थान में बनाती हैं। इनका भोजन ज्यादातर इंसानी भोजन से मिलता जुलता है पेड़ पौधों और कीड़ों के अलावा।
इन पक्षियों के घोंसले अधिकतर घरों, छज्जों तले या वृक्ष के किसी छोटे बिल में होते हैं। कभी-कभी ये हमारे घर के अंदर भी अपना घोंसला बना लेते हैं। इन पक्षियों में एक विशेष आदत यह होती है कि ये जब भी अंडे देती है अपने घोंसले को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए अपने पुराने घोंसले को और मजबूत बनाती है या नया घोंसला बनाती है, जिसमें मादा पक्षी (गोरैया) अंडे देती है और अंडे देने के उपरांत जब तक अंडे में से बच्चे जन्म न ले ले, तब तक मादा चिड़िया घोंसले में ही रहती है और नर चिड़िया उसकी देख-रेख करता है। वह मादा के लिए दाना (भोजन) चुगकर अपने बच्चों की तरह (नर चिड़िया) मादा को खिलाता है।
इनका स्वरूप बहुत सुंदर काले भूरे और कत्थई रंग में होता और इनके शरीर पर छोटे-छोटे पंख और पीली चोंच व पैरों के रंग भी पीलापन लिए होता है। जब उड़ान भरती हैं तो पैरों का सहारा लेती है लेकिन उड़ान केवल 25 से 40 फूट ऊपर आसमान की तरफ उड़ पाती है । चहकना और फुर फुर उड़ना इनकी अनोखी कला होती है इसकी वजह से इनको फुर भी बोलते है ।
।। नन्ही सी गौरैया ।।
मैंने देखा हैं,
अपने घर आंगन में गौरैया को आते जाते । मैं भी रखती हूं दाना पानी उसके वास्ते! देखती हूं जब भी उसे गौर से अटखेलिया करते अपने घोंसले में । यकीन मानो, खो सा जाती हूं उसके अस्तित्व में थोड़ा सा मैं । कभी फुदक के इधर बैठना,कभी फुदक के उधर बैठना । कभी आपस में दाना चुगने के लिए झगड़ना,कभी ची ची करके मुझे चाहती हैं खुद से दूर करना । शायद! डरती हैं मुझसे, मैं ना करूं जरा सा भी परेशां उनको क्या, आप जानते हो । गौरैया हैं आज विलुप्त की कगार में क्या हैं हमारा दायित्व उनके प्रति । आइए मिलकर, इनका संरक्षण करे । और इनकी जनसंख्या को एक से अनेक करे ।। गौरैया दिवस की ढेर शुभकामनाएं ।।
![]स्नेहा कृति (रचनाकार और सह संयोजक राष्टीय जंगल बचाओ अभियान ) कानपुर U.P.
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