**लेखक वीरेंद्र यादव ** ‘नमक खाना’ एक ऐसा मुहावरा है, जिसमें सामंती काल की वफ़ादारी की अनगूंज है. जब जनतांत्रिक व्यवस्था में एक मतदाता राज्य द्वारा दी जाने वाली सुविधा के बदले सत्तातंत्र के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए चुनाव के दौरान अपना मत उसे ही देने का वचन देता है,तो वह चुनावी तंत्र की उस विकृति का शिकार होता है ,जो उसे स्वतंत्र देश के नागरिक से एक गरिमाहीन लाभार्थी में तब्दील कर देती है. संविधान निर्माताओं ने भारतीय संविधान में नीति निर्देशक संबंधी अध्याय को इस मंशा से शामिल किया था कि राज्य कल्याणकारी लक्ष्यों को प्राप्त करते हुए नागरिक की गरिमा को बनाए रखे. लेकिन इस निर्मम पूंजीतंत्र ने संविधान की कल्याणकारी अवधारणा के विपरीत सामर्थ्यवान के ही जीवित बचे रहने का सिद्धांत प्रतिपादित किया है. चुनावी प्रचार के दौरान जब प्रधानमंत्री एक बेबस बूढ़े दम्पति द्वारा नमकखाने का जिक्र अपने नाम से जोड़कर करते हैं, तब वे मतदाता से सामंती समाज की वफ़ादारी की ही चाहत रखते हैं. इसे उन्होंने वैक्सीन अभियान के संदर्भ में खुल्लमखुल्ला अपने प्रति धन्यवाद का सरकारी होर्डिंग लगवाकर अभिव्यक्त भी किया है..यह अकारण नहीं है कि अब नए भारत में नागरिक अधिकार पर नहीं कर्तव्य पर जोर दिया जाने लगा है. स्पष्ट है कि सामंतशाही में सामर्थ्यवान के अधिकार तभी सुनिश्चित रह सकते थे, जब प्रजा राजा के प्रति अपने कर्तव्य निर्वहन का दायित्व निभाती रहे. यह अकारण नहीं है कि ‘मनुस्मृति’ उच्च वर्णों के विशेषाधिकारों को सुनिश्चित करते हुए मेहनतकश श्रमशील समाज के कर्तव्यों की पुष्ट व्यवस्था करती है. तो यह दौर प्रकारांतर से जनतंत्र को सामंततंत्र में बदलने का है. सचमुच ‘नया भारत.’

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