![]आत्माराम त्रिपाठी की✍️से
(हिजाब के सम्बन्ध में)
आज भगवा वस्त्र धारण करने से धोती कुर्ता पहनने से तिलक लगाने से कौन रोक रहा है ? आप ही लोग तो पीछा छुड़ाएं बैठे है इन चीजों से ! मुस्लिमों ने अपनी जड़ें न कल छोड़ी थीं न आज छोड़ने को राजी हैं! हमने देखा है धोती कुर्ता पगड़ी पहने माथे में तिलक जो भारतीय संस्कृति की पहचान थी जिसकी जगह पहले कुर्ता पैजामा फिर बेलबाटम ने ली और अब जिंस ने पूर्ण रूप से हम अपनी संस्कृति सभ्यता से बिमुख हो पश्चिमी सभ्यताओं को अंगीकार किया हम विकसित हो रहे हैं किन्तु अपने मूल स्वरूप को खोकर आखिर इसके लिए दोषी कौन है ? जब हम आप लोग खुद पहले तिलक, लगाते थे मलमल के महीन वस्त्र धारण करते सर पे शिखा,रखाते और शान से निकलते किंतु आज शर्म आती है यह सब करने में ऐसा करने से आप आजकी शिक्षित पीढ़ी में गवार जाहिल अपने आप को महसूस करते हुए अपने संस्कारों अपनी सभ्यता को तिलांजलि दे बैठते हैं तो इसके लिए किसी दूसरे को दोषी ठहराया जाना कहां तक उचित है? आज हम लोगों ने ही आधुनिकता के नाम पर खुद ही सब कुछ त्याग दिया है हम नहीं त्यागते तो स्कूल में धोती कुर्ता पहनना नॉर्मल माना जाता!बीएचयू में डिग्री लेते वक्त बच्चों का भारतीय पारंपरिक पोशाक पहनना खबर बनता है, जबकि यह तो नॉर्मल होना चाहिए था न ?खबर तो यह होती न कि हिंदू छात्रों ने गाउन पहन कर डिग्री ली आज हमने खुद अपनी संस्कृति, अपने रीति रिवाज अपनी जड़ों को पिछड़ेपन के नाम पर त्यागा है आज इतने साल बाद आप लोगों की नींद खुली है तो आप लोगो को उनकी जड़ों की तरफ लौटने के लिए कहते फिरते हैं। अपनी नाकामी, अपनी लापरवाही का गुस्सा हम दूसरों की जड़ों को काट कर क्यों निकालना चाहते हैं ? आज हमारे बच्चे कॉन्वेंट से पढ़ने के बाद पोएम सुनाते हैं तो सर ऊंचा होता है गर्ब की अनुभूति होती है ! यंहा एक वाकया याद आ रहा है बात है आज से 40वर्ष पुरानी मैं अपने मुस्लिम मित्र के यहां निमंत्रण में गया हुआ था तो देखता हूं कि उस मुस्लिम मित्र के यहां उनके बिरादरी के बहुत सारे लोग एकत्र हुए थे की मित्र का लड़का आया उससे उन्होंने नमाज की लाइनें सुनाने को कहा लड़का नहीं सुना सका तो उस हमारे मित्र ने कहा कि हमारे मुस्लिम घरों में बाप का सिर तब झुक जाता है जब बच्चा रिश्तेदार के सामने कोई दुआ न सुना पाए ! हमारे घरों में बच्चा बोलना सीखता है तो हम सिखाते हैं कि सलाम करना सीखो बड़ों से, आप लोगों ने नमस्कार को हैलो हाय से बदल दिया तो यह हमारी गलती है ? आज वही स्थिति है हमारे यहां बच्चा चलना सीखता है तो बाप की उंगलियां पकड़ कर मुसलमान मुस्लिम का मस्जिद जाता है! और हम लोगों ने खुद मंदिरों की तरफ देखना छोड़ दिया गीता पुराणों की तरफ देखना छोड़ दिया सुबह शाम रामायण की पांच दोहे घरों में पढ़ें जाते थे उसकी जगह ब्लूटूथ से भजन सुने जाने लगे ढोलक हरमोनिया की जगह डीजे की कर्कस ध्वनि ने ले ली तो बच्चे कैसे जानेंगे कि मंदिर में जाकर क्या करना है, यह हमारी गलती है? हमआप लोगो ने नामकरण और मुंडन जैसे फंक्शन को बर्थ-डे और एनिवरसिरी से बदल दिया तो यह हमारी गलती है ? हमआप ने जब नया घर लिया तो पुराने घर से गीता लेकर नहीं आए तो यह भी हमारी गलती है? हम आपके पास तो सब कुछ था- संस्कृति, इतिहास, परंपराएं! हम आपने उन सब को पिछड़पन की निशानी मान कर त्याग दिया, मुस्लिम मित्र का कहना है की हम ने नहीं त्यागा बस इतना फर्क है! क्या सिखा रहे हैं आप अपनी पीढ़ी को? आपको देखकर, आपके आचरण, आपके रहन सहन , आपकी आदतों से क्या सीखेगी आपकी आने वाली पीढ़ी? तिलक तो घर से निकलने से पहले लगाते थे न आप लोग? क्यों छोड़ दिया? किसने रोका आपको? आप का बच्चा कॉन्वेंट से पढ़ कर आता है और आप उसके बड़े होने पर अफसोस करते है कि देखो कॉन्वेंट हमारा कल्चर खा गया! पर कभी सोचा है कि बच्चा स्कूल से आकर तो आप ही के साथ आप के ही पास था? आपने क्या किया तब*? हमारे मजहब का लड़का कॉन्वेंट से आकर उर्दू अरबी पढ़ने बैठ जाता है! आप को आज हिजाब के मामले पर याद आया कि यार हम भी तो भगवा गमछा ओढ़ सकते हैं! पर इसके पहले आपने कोशिश क्यों नहीं की कभी? कल्चर तो बनाइए इसको पहले, तब बराबरी कीजिएगा कि हम भी पहनेंगे, ऐसा न हो कि जोश जोश में आप इजाजत ले लो, फिर आने वाली पीढ़ी खुद ही पहनना छोड़ दे सो हम अपने इस लेख के माध्यम से बस इतना ही कहना चाहते हैं की हिजाब के मुद्दे को राजनीतिक रंग मत दीजिए न कालेज विद्यालयों यानी गुरूकुलो को इसमें शामिल करें। इन्हें पाक साफ रहने दें और सभी समुदायों के लोगों से भी यही कहना है की पहले अपने आपको बदलो ।
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