(एक व्यंग) हमें गर्ब है हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र देश के नागरिक हैं
![]आत्माराम त्रिपाठी लेखक
आत्माराम त्रिपाठी की✍️से आजकल देश के कुछ शहरों में अवैध तरीके से शराब की होम डिलेवरी का कार प्रारंभ हो चुका है। जो भी शराब से जुड़े कुछ चालाक किस्म के हैवान हैं वै इस अवैध धंधे के माध्यम से देश के शिक्षित अशिक्षित सभी बेरोजगारों को जाब देकर राष्ट्र सेवा का दायित्व निभा रहे हैं। आजकल राष्ट्र सेवा का मतलब केवल सीमा पर सैनिक बनकर या अच्छा शिक्षक डॉक्टर इंजीनियर बनकर देश वासियों की सेवा करना ही नहीं है। आप पुलिस को दारू पिलाकर अफसर को रिश्वत की गड्डी थमा कर पत्रकार को भरपूर विज्ञापन दिलवा कर नेताओं से सिफारिश करवा कर कोई ठेका हतिया कर भी राष्ट्र सेवा समाज सेवा कर सकते हैं जो सरकार नहीं कर सकती वह काम आप अवैध तरीके से करते हुए देश के शिक्षित युवाओं को किसी तरह जाब में लगवा सकते हैं। देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बना सकते हैं इसका सबसे अच्छा उदाहरण तो सारे देश में अवैध रूप से संचालित सत्ता बाजार को ही मान लीजिए जितनी इमानदारी परस्पर विश्वास या भरोसा सत्य के धंधे में हैं उतना तो विधायिका कार्यपालिका न्यायपालिका पर भी कुछ लोग नहीं करते हैं। सट्टा पट्टी लिखने वाला वर्षों से इस कार्य से जुड़कर अपने पूरे परिवार के साथ ही समाज की भी सेवा करता है। खाईवाल है कि साल 2 साल में ही किसी ईमानदार विधायक से ज्यादा कमाई करते हुए प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करने लगता है। पिज़्ज़ा डिलेवरी बॉय से ज्यादा फुर्ती से शराब की बॉटल लोगों के भरो तक पहुंच जाती है। कॉल करो और माल हाजिर। अब रहा सवाल पुलिस एवं आबकारी विभाग की भूमिका की तो यह सार्वभौमिक सत्य है की जाको राखे साइयां मार सके ना कोई बाल न बांका कर सके जो गांधी छाप होई। अर्थात रुपए मे वो आत्म में शक्ति होती है की भाई साहब की पुलिस किसी को दबोच ही नहीं सकती ठीक उसी प्रकार जिस तरह अबैध खनन करने वाले वैधानिक रेत ठेकेदारों को प्रशासन की तरफ से फटकार मिल जाती है और फिर कालांतर में सभी जप्त गाड़ियां छूट जाती हैं। आखिर यह बेचारे सैकड़ों लोगों को काम ही तो दे रहे हैं। गरीबों को शासन कोई छूट दे या ना दे यह लोग तो अपनी ओर से सारे प्रशासन को राहत प्रदान करते हुए राष्ट्र सेवा में निरंतर लगे रहते हैं कुछ लोग इनकी बेहिसाब संपत से जॉय स्वभाव रखते हुए अनावश्यक रूप से इनकी समाज सेवा को कलंकित करने का प्रयास करते हैं वह लोग वास्तव में नासमझ लोग हैं। उन्हें देश की राजनीति और कूटनीति में क्या अंतर है समझ ही नहीं आता खैर छोड़िए जॉब की बातें आजकल तो जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं उन राज्यों में तो हजारों युवाओं बुजुर्गों एवं मातृ शक्तियों कोर्ट लगभग 1 माह के लिए ही सही अच्छा खासा जॉब मिल गया है चुनाव प्रचार में घूमने का पोस्टर बैनर प्लेक्स लगाने का बनाने का चुनाव आयोग की पानी नजर से बचते हुए अपने समर्थकों की ओर से कुछ आवश्यक रास वस्त्र और उपहार बांटने का। अब हम चले कर्नाटक की ओर जहां जॉब तो बहुत मिलता है लोगों को किंतु हिजाब वाला कोई मिल गया तो मुद्दा रंग ले आता है। तब चीफ जस्टिस आप इंडिया को कहना पड़ता है कि हिजाब के स्थानीय मुद्दे को राष्ट्रीय बनाने की कोशिश ना करें मैं बहुत आभारी हूं अपने सर्वोच्च न्यायालय के जो सही समय पर सही सुनवाई करते हुए हमारी जनता को निर्णय देते हैं कभी-कभी हम सोचते हैं यदि सर्वोच्च न्यायालय नहीं होता तो हमारे देश की नेतागिरी और अफसरी हमें मरते दम तक प्रताड़ित ही करती रहती। भला हो संविधान सभा के सभी लोगों का जिन्होंने अच्छा खासा लिखित संविधान लोक अर्पित करके चले गये। अन्यथा आज के जमाने में संविधान सभा का गठन करने में ही सिफारिश चलती हर कोई जुगाड़ में लगा लगे रहता। जहां तक किसी शिक्षा संस्थान की पोशाक की बात है हम सभी संस्था के ड्रेस कोड का पालन तो करते ही हैं कुछ लोग यूनिफार्म के रंग का हिजाब पहनने की अनुमति चाह रहे हैं जो भी हो अब तो माननीय हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश तो दे दिया है फिर भी हम सबको आपसी सौहार्द बनाए रखते हुए राष्ट्रीय हित में ही विचार करना चाहिए प्राय: यह देखा जाता है की हम अपने निजी स्वार्थों के वशीभूत होकर हर मुद्दे को हल करवाना चाहते हैं जबकि माननीय न्यायालय की सोच सर्व हितकारी होती है बाबा तुलसीदास जी कहते हैं परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पारो पीड़ा नहीं आज माई ।अतयव हम भारत के लोगों को आत्मनिर्भर बनते हुए भरपूर मेहनत करनी चाहिए किन्तु जिसको देखो वही आज सर्वर के भरोसे बैठा है। बैंक में जाओ तो सर्वर पोस्ट ऑफिस में सर्वर ऑफिस में सर्वर कलेक्टर के यहां सर्वर मिनिस्टर के यहां सर्वर ये सर्वर ठीक-ठाक है तो समझो काम में नहीं होगी गड़बड़। अब आप ही सोचिए कौन बना रहा है आत्मनिर्भर केवल जॉब देने वाला जॉब लेने वाला हिजाब लगाने वाला या हिजाब हटाने वाला शराब अवैध रूप से बेचने वाला या अवैध रूप से दिखाने वाला प्रश्न गंभीर है फिर भी हमें आजादी के अमृत महोत्सव में कुछ कीर्तिमान तो स्थापित करने ही पड़ेंगे चाहे आत्मनिर्भर बनकर करें या दूसरों की कृपा दृष्टि पर चलकर। जय हो नेतागिरी की आज ही एक नेता जी का बयान पढ़ने में आया सरकार जॉब देने के बजाय हिजाब के मुद्दे में उलझा रही है नेताजी को अब कौन समझाए की उलझे हुए दल को कौन उलझा सकता है जहां तक एक पार्टी को नए मुद्दों का बिच्छू मान भी ले तो भी नेता जी के दल में ही एक से बढ़कर एक गिरगिट बैठे हैं जो मौका और मौसम देखकर दल बदल कर लेते हैं हमें तो इस बात पर गर्व होना चाहिए कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिक हैं।
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