आत्माराम त्रिपाठी की✍️से

आज पूरे उत्तर प्रदेश में चुनावी समर के योद्धा मैदान में उतर चुके हैं सभी अपनी म्यानों से तलवारें निकाल कर भांज रहें हैं। कोई जुबानी तलवार भांज रहा है तो कोई करेंसी की कोई धमका रहा है तो कोई खरीद रहा है कहीं कमीशन खोरी दलाली की करेंसी मतदाताओं को लुभाने के काम आ रही है तो कहीं अबैध खनन ओवरलोडिंग से कमाई हुई दौलत का स्तेमाल इस चुनाव में देखने को मिल रहा है। चुनावी महाभारत में आज युधिष्ठिर नजर नहीं आ रहा अगर कोई नजर आता है तो वह है दुर्योधन जिसके संगी-साथी दुशासन एवं सकुनी है जिनकी नस नस में छल फरेब धोका है सत्ता पद सिंहासन का मोह है इसके लिए यह कुछ भी कर सकते हैं। आज के इन रथियों महारथियों में कोई नैतिकता नहीं है कोई अपना चरित्र नहीं है कोई सिद्धांत नहीं है सभी अपने को महापुरुष बिकास पुरुष बताने में संकोच नहीं करते वंही इनके अंधभक्त इनको महिमा मंडित करने में मददगार साबित होते हैं। जबकी यह नतो महापुरुष हैं नहीं बिकास पुरुष देस को खोखला करने वाले दीमक है यह। देश को आजाद कराने में जिन महापुरुषों ने अपने प्राणों का बलिदान किया उन लोगों ने एक ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना की थी जिसमें छल-कपट भ्रष्टाचार हिंसा का कोई अध्याय नहीं था किन्तु उन महान बलिदानियों के कल्पना के बिपरीत आज वह सबकुछ देखने को मिल रहा है जिसकी उन्होंने कल्पना भी कभी नहीं की होगी। चाटुकारिता में कुछ कलमकारों ने अपनी लेखनी को पुराने राजा महाराजाओं के यहां राजकवियो भाटो की तरह गुडगान करने हेतु अपनी कलमो से निकलने वाले शब्दो को संजोकर रख लिया है व उन्ही के तरह राग अलापने लगे हैं अपने अपने जमीर को इनके पास गिरवी रख कर धिक्कार है ऐसे कलमकारों पर व उनकी पत्रकारिता को जिनमें सच लिखने का सच बोलने का साहस नहीं है।

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