लेखक अभिषेक खरे पीपल नीम तुलसी अभियान 🌳🌳🌳
सोचिये अगर हमारे शरीर को पोषण देने वाला अनाज अगर स्वयं ही पोषण मुक्त हो,और जीवन रक्षक अनाज में अलग से पोषण मिलाने की जरूरत पडने लगे वह पोषण भी किसी फैक्ट्री में बने।तो निश्चित ही हमारा दुर्भाग्य है।ऐसा ही चलता रहा तो हमारी आने बाली मासूम पीढ़ी को गेहूं,चना,चावल,घी,तेल आदि व अन्य खाद्य पदार्थों का पोषण और स्वाद दुकानों से खरीदना पडेगा और खेतों से तो केवल इन चीजों की सिर्फ आकृति का ही उत्पादन होगा वह भी अगर जमीनें जिन्दा रही तब। पैसे से अनाज तो खरीदा जा सकता है लेकिन अनाजों का पोषण नहीं। समय है, हमें लौटना होगा नहीं तो आगे सिर्फ विनाश है और कुछ भी नहीं। समय के साथ परिवर्तन पृकृति है,लेकिन इसमें मानव हस्तक्षेप विनाश।हमें पृकृति बचाने के लिये विकाश करना चाहिए न कि पृकृति का दोहन कर विकास। लोग सब जानते है सब समझते हैं।फिर भी अंजान बने बैठे हैं। सभी कही न कहीं पृकृति के दोषी है। हम सब मिलकर पृकृति को अपने अपने स्तर पर स्वच्छ रखें,दोहन को रोके।अपने लिए न सही अपने बच्चों के लिये स्वच्छ हवा,स्वच्छ पानी,शुद्ध आहार,शुद्ध विचार कुछ तो छोड़ कर जायें।
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