लेखिका सुमित्रा रॉय सूत्र FB wall
आज से 150 साल पहले दादाभाई नौरोज़ी ने “ड्रेन थ्योरी” में बताया था कि किस तरह अंग्रेज़ सरकार भारत के लोगों की दौलत लूटकर ब्रिटिश जनता को मालामाल कर रही थी।
उस समय अम्बानी-अडाणी तो थे नहीं। लेकिन आज अम्बानी का ब्रिटेन की राजधानी लंदन में आलीशान बंगला है।
और नरेंद्र मोदी की सरकार ने अंग्रेज़ी सरकार के नक्शे-कदम पर चलते हुए इस बजट में फिर 1 लाख 47 हज़ार करोड़ रुपये अम्बानियों-अडाणियों को लुटा दिए। और दरबारी पेडिग्री मीडिया के इशारे पर सोशल मीडिया में मित्रगण इनकम टैक्स में राहत न मिलने का दुखड़ा रो रहे हैं।
1.47 लाख करोड़। जी हां। चौकिये मत और न ही मुझसे दोबारा पूछें कि इनकम टैक्स, GST और बेज़ा लूट का पैसा जा कहाँ रहा है?
इसलिए, क्योंकि देश की 95% मूर्ख अवाम भेड़ों की तरह गुलामी कर रही है।
मोदी सरकार की शातिर वित्त मंत्री ने 1.47 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी और बजट कटौती की रकम को पूंजीगत व्यय के रूप में 1.48 लाख करोड़ की बढ़ोतरी बताया है। इसे ही बिकी हुई भांड मीडिया विकास का सूचक बता रही है।
ये पैसा प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री की बपौती नहीं, आप, मैं हर करदाता का पैसा है। ये पैसा सीधे अम्बानी-अडाणी के पास जाएगा। इसे दलाली कहते हैं और देश की निर्वाचित सरकार खुलेआम दलाली कर रही है।
बीजेपी यूं ही बीते 7 साल में सबसे अमीर पार्टी नहीं बनी। यही पैसा भारत में लोकतंत्र को खरीदने के काम आता है।
संविधान का अनुच्छेद 39(सी) सरकार को ऐसी आर्थिक नीति बनाने को कहता है, जिसमें संपत्तियों का केंद्रीकरण देश में असमानता और अमीरी को न बढ़ाये।
मैं दावे से कहता हूं कि अगर इसी अनुच्छेद के सहारे कोई मोदी सरकार के बजट को कोर्ट में ठीक से चुनौती दे तो सरकार को मुंह की खानी पड़े।
बजट से पहले 83% लोगों ने सरकार से अपने पालतू अमीरों पर वेल्थ टैक्स और सेस लगाने की उम्मीद की थी। लेकिन मोदी सरकार ने उल्टे कॉर्पोरेट टैक्स फिर कम कर दिया।
नोटबंदी और GST के बाद 2018 से भारत हर रोज़ 70 नए लखपति पैदा कर रहा है। (ऑक्सफेम इंडिया रिपोर्ट)
उधर, ग़रीब भारत में 5 रुपये के पारले जी बिस्कुट तक की मांग कम हो गई है।
यही नौबत 2019 के बजट में भी देखने को मिली थी, जब मोदी सरकार ने निजी निवेश बढ़ाने के लिए पूंजीगत निवेश की ज़रूरत बताकर कॉर्पोरेट टैक्स 30 से घटाकर 22% कर दिया था। 1.45 लाख करोड़ तब भी सीधे अमीरों के खाते में चले गए।
और वही पैसा शेयर बाजार, निवेश और लोन अदायगी में लगा। मीडिया ने भौंकना शुरू किया कि अच्छे दिन आ गए। नतीजा यह हुआ कि लाखों नौकरियां और रोज़गार छिन गए।
भारत की जनता में थोड़ी सी भी समझ होती तो उसी दिन सरकार की मंशा भांप लेती, जब 2015 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वेल्थ टैक्स खत्म किया था।
भारत का संविधान सरकार को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय के लिए बाध्य करता है। लेकिन संविधान पर पोथा लिखने वाले कथित पंडित आपको यह बात नहीं बताएंगे।
अगर बता दें तो उनकी कोठियां कैसे खड़ी होंगी? ये वही लोग हैं, जिनकी जुबां पर गांधी और दिल में नाथूराम मिलेंगे।
ये वही संघी भाजपाई हैं, जो अपने आका अंग्रेजों की तरह आम जनता को मूर्ख बनाकर लूट रहे हैं।
ग़ुलामी से निकलिए और देश को ईस्ट इंडिया कंपनी से आज़ाद करवाइए। 🙏🙏
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