कभी आपने सोचा है कि जरा सा विचार वासना का, और जननेंद्रिय का पूरा यंत्र सक्रिय हो जाता है। विचार चलता है मस्तिष्क में, यंत्र होता है बहुत दूर, परन्तु तत्काल चक्र सक्रिय हो जाता है। असल में आपके चित्त में काम—वासना का कोई भी विचार उठे, तत्काल सेक्स का सेन्टर उसे अपनी ओर खींच लेता है। उसे उस ओर जाना ही पड़ेगा, जाने की और कोई जगह नहीं है। जैसे पानी गड्डे में चला जाता है, वैसा प्रत्येक सम्बन्धित विचार अपने चक्र पर चला जाता है। तो दोनों आंखों के बीच में जो तीसरे नेत्र की मैं बात कर रहा हूं वही जगह आज्ञाचक्र की है। इस आज्ञा के संबंध में थोडी बात समझ लेनी जरूरी है।
जिन लोगों के भी जीवन मे यह चक्र प्रारम्भ नहीं होगा वह हजार तरह की गुलामियों में बंधे रहेंगे, वे गुलाम ही नौ। इस चक्र के बिना कोई स्वतंत्रता नहीं है। यह बहुत हैरानी की बात मालूम पड़ेगी। हमने बहुत तरह की स्वतत्रता सुनी है—राजनीतिक आर्थिक—ये स्वतंत्रताएं वास्तविक नहीं हैं। क्योंकि जिस व्यक्ति का आज्ञाचक्र मक्रिय नहीं है, वह किसी न किसी तरह की गुलामी में रहेगा। एक गुलामी से छूटेगा दूसरी में पडेगा, दूसरी से छूटेगा तीसरी में पड़ेगा, वह गुलाम रहेगा ही। उसके पास मालिक होने का तो अभी चक्र ही नहीं है जहां से मालकियत की किरणें पैदा होती हैं। उसके पास संकल्प जैसी, ‘विल’ जैसी कोई चीज ही नहीं है। वह अपने को आता दे सके ऐसी उसकी सामर्थ्य नहीं है, बल्कि उसके शरीर और उसकी इंद्रियां ही उसको आज्ञा दिए चली जाती हैं। पेट कहता है भूख लगी है, तो उसको भूख लगती है। काम—वासना का बिन्दु कहता है, वासना गट्टे, तो उसे वासना जगती है। शरीर कहता है बीमार हूं तो वह बीमार हो जाता है। शरीर कहता है, बूढ़ा हो गया तो बूढ़ा हो गया। शरीर आज्ञा देता है, आदमी आज्ञा मानकर चलता है। लेकिन यह जो आज्ञाचक्र है, इसके गाते ही शरीर आशा देना बन्द कर देता है और आज्ञा लेना शुरू कर देता है। पूरा का पूरा आयोजन बदल जाता है और उल्टा हो जाता है। वैसा आदमी अगर बहते हुए खून को कह दे, रुक जाओ, तो वह बहता हुआ खून रुक जाएगा। वैसा आदमी अगर कह दे हृदय की धड़कन को कि ठहर जा, तो हृदय की धड़कन ठहर जाएगी। वैसा आदमी कहे अपनी नब्ज से कि मत चल, तो नब्ज चल न सकेगी। वैसा आदमी अपने शरीर, अपने मन, अपनी इन्द्रियों का मालिक हो जाता है। पर इस चक्र के बिना शुरू हुए मालिक नहीं होता। इस चक्र का स्मरण जितना ज्यादा रहे, उतना ही ज्यादा आपके भीतर, स्वयं की मालिकी पैदा होनी शुरू होती है। आप गुलाम की जगह मालिक बनना शुरू होते हैं।
‘योग ने उस चक्र को जगाने के बहुत—बहुत प्रयोग किए हैं। उसमें तिलक भी एक प्रयोग है। स्मरणपूर्वक, अगर कोई चौबीस घण्टे उस चक्र पर बार—बार ध्यान को ले जाता रहे तो बड़े परिणाम आते है। अगर तिलक लगा हुआ है तो बार—बार ध्यान जाएगा। तिलक के लगते ही वह स्थान पृथक हो जाता है, वह बहुत सेंसिटिव स्थान है। अगर तिलक ठीक जगह लगा है तो आप हैरान होंगे, आपको उसकी याद करनी ही पड़ेगी, बहुत संवेदनशील जगह है। सम्भवतः शरीर में वह सर्वाधिक संवेदनशील जगह है। उसकी संवेदनशीलता का स्पर्श करना, और वह भी खास चीजों से स्पर्श करने की विधि है—जैसे चंदन का तिलक लगाना। ओशो👼
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