हम जो सुनते हैं वही बन जाते हैं
लेखिका रीवा एस सिंह FB wall
स्कूल के दिन थे। हर स्टूडेंट को क्लास में एक-एक टेबल व चेयर मिली थी। बैग नीचे रखना पड़ता था। सब रखते थे। मैं थोड़ा हिचकिचाती थी कि बैग में बुक्स हैं, नीचे कैसे रख दूँ! फिर रख ही देती। बहुत ख़याल रखती कि बैग के स्ट्रैप पर भी किसी का पैर न लगे, मेरा तो बिल्कुल नहीं।
मुझसे कई गुना ज़्यादा सतर्क एक दोस्त थी। उससे बैग नीचे नहीं रखा जाता था। कहती – विद्या माँ को कैसे नीचे रख दें! ये तो ग़लत है न कि ख़ुद ऊपर बैठो और बैग नीचे रख दो। लेकिन किताबों से भरा बैग अगर कुर्सी पर हो तो बैठने की जगह नहीं होती इसलिए अंततः मान गयी। आज के चश्मे से देखें तो कहेंगे कि वह मुस्लिम थी, माँ सरस्वती से कोई ख़ास लेना-देना नहीं होना चाहिए। मूर्ति पूजा भी नहीं होती उनके यहाँ। लेकिन शुक्र है वह दौर दूसरा था। वह मुस्लिम थी ईद की सेवइयों के लिये, बाकी दिन सिर्फ़ दोस्त थी।
हमारी एक टीचर थीं जो वसंत पंचमी के दिन ज़रूर लीव लेती थीं। वैसे वो कभी छुट्टी नहीं लेतीं, हम सोचते भी नहीं कि उनके पीरियड में कभी ऑफ़ मिलेगा लेकिन सरस्वती पूजा के दिन पक्का था। वो कहतीं कि उनके यहाँ इस दिन किताब को हाथ नहीं लगाते, पूजा करते हैं। बतातीं कि बहुत उत्सव व उल्लास वाला माहौल होता है।
जबसे हमें यह बात पता चली, वसंत पंचमी के दिन यह और याद आता। वह दोस्त किसी बात पर सख़्ती से कुछ कहती, स्कूल रूल्स पर कोई टिप्पणी करती और कह पड़ती कि सरस्वती पूजा के दिन स्कूल खोल रखा है। इस दिन पढ़ा नहीं जाता है लेकिन ज़बरदस्ती पढ़ायेंगे, गिल्ट तो हमलोग फ़ील करेंगे न। एक दिन के ऑफ़ में क्या चला जाता इनका! वो इतनी सख़्ती से कहती कि मुझे हँसी आ जाती। मैं समझाती कि पूजा तो असेम्ब्ली में हुई है न, तो पढ़ने में क्या ही प्रॉब्लम है। पढ़ायें, पढ़ तो रहे ही हैं – उसका जवाब आता। वो सरस्वती माँ को लेकर सेंसिटिव थी। बचपन से यही सुना कि वो विद्या की देवी होती हैं और विद्यार्थी के लिये विद्या से बढ़कर क्या होता!
हम आज जो धर्मों में बँटे जा रहे हैं और इस तरह बँटे जा रहे हैं कि पहले मुस्लिम बुरे बने, फिर ईसाई और अब तो सिख भी… यह सब यूँ ही नहीं है। यह रोज़ हममें भरा जा रहा है ख़ुराक दर ख़ुराक। हम जो सुनते हैं, वही बन जाते हैं। हम में से सबसे लिबरल लोग भी अगर आत्मनिरीक्षण करें तो पायेंगे कि बेहद सरल होने के बावजूद वो भी पहले से नहीं रह गये हैं। न चाहते हुए भी हमारे आसपास जो होता है उसका असर पड़ता है। और कुछ नहीं तो इतना ही कि हम निराशा की ओर बढ़ने लगते हैं, हतोत्साहित होते हैं, हमारे भीतर कुछ मरता है। मनुष्यता ज़रा कम होती है, मशीनीकरण ज़रा बढ़ता है।
अब ऐसे दोस्तों के वॉट्सऐप स्टेटस अरबी कोट्स से भरे होते हैं। ईश्वर के भिन्न रूप के आधार पर या अरबी में लिखे कोट्स के आधार पर जज नहीं करना है। लेकिन लगता है कि हम आगे बढ़ते हुए पीछे खिसक गये, हम मतलब हम सभी।
हमें और धर्मनिरपेक्ष होना था लेकिन आज हम धर्मांधता में सराबोर हैं। देश के जवान शहीद होते हैं तो इसी देश में पटाखे फूटते हैं और एक मुस्लिम युवक अपने स्टॉल पर ‘कृष्णा’ लिख लेता है तो उससे बोर्ड हटवाया जाता है, बिक्री रोक दी जाती है। बोर्ड हटवाने कृष्ण नहीं आते हैं, न ही भेजते हैं। राम से नहीं सीखी जा रही शालीनता, पूरे रामायण में सिर्फ़ एक बार राम क्रोधित होते हैं, वह भी तपस्या करने के बाद, समुद्र देव पर। धर्म के नाम पर वही क्रोधित राम हर बैनर में हैं।
हम जो चुनते हैं, जो सुनते हैं, वैसे ही हो जाते हैं।
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