तलाक का नाम सुनते ही हम सबके जहन में सिर्फ एक ही चित्र सामने आता है,और वह है एक संस्कार विहीन महिला का! अधिकांश लोगों का समाज में यह मानना होता है कि अगर तलाक हुआ है तो इसकी जिम्मेदार महिला ही होगी,क्योंकि उसने अपना घर अच्छे से नहीं संभाला होगा! और एक तलाकशुदा महिला को समाज के लोग इस तरह से देखते हैं और घूरते हैं कि जैसे वह इस समाज का हिस्सा ही ना हो,जैसे वह गलत हो,जैसे उसने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो तलाक लेकर!
आज मैं आपको एक सच्ची घटना बताऊंगी अब आप लोग ही निर्णय करना!हां पहले की बात मैं नहीं करूंगी कि जहां पहले महिलाएं हर तरह से निभाने की कोशिश करती थी,मैं यह कहूंगी कि उसे निभाना नहीं कहते हैं,उसे गुलामी कहते हैं,जैसे जब अंग्रेजों ने हमारे देश को गुलाम बनाया था, तो हम लोग उन लोगों के साथ निभा नहीं रहे थे, हम गुलामी कर रहे थे उनकी, और जिन लोगों ने आजाद होने के लिए आवाज उठाई वह क्रांतिकारी कहलाए, तो तलाक शब्द में तलाकशुदा महिला को क्रांतिकारी ना कहकर,गलत क्यों समझा जाता है क्योंकि उसने भी तो गुलामी और अत्याचार को स्वीकार नहीं किया, इसका मतलब वह महिला बाकी महिलाओं से,जो समाज के डर से रोज अत्याचार और गुलामी सहन करती हैं उन महिलाओं से वह महिला बहुत ही बहादुर,मजबूत और हौसलों से भरी हुई है,अभी तक,कि जो इतने लोगों के खिलाफ लड़कर जो उसको मजबूर करते हैं गुलामी और अत्याचार सहन करने के लिए, कभी सनातन संस्कृति का हवाला देकर,कभी यह कहकर की तलाक लेकर तुम्हारी जिंदगी कटी पतंग की तरह हो जाएगी, यह सब सुनने के बाद भी वह महिला आजादी की लड़ाई लड़ती है!
बात 2017 की है जब मैं अपनी एक सहेली के साथ कोर्ट में गई थी! वहां बैठकर हम दोनों बातें करने लगे! बातों ही बातों में मैंने अपनी सहेली से कहा कि आज मुझे अपने पतिदेव के दर्शन कराना! कुछ समय बाद काला कोट पहने,आप खुद समझदार हैं काला कोट पहनकर कोर्ट में कौन आता है,काले कोट वाले व्यक्ति के साथ में एक बुजुर्ग महिला कोर्ट के अंदर आती है और,हमारे आगे वाली सीट पर दोनो बैठ जाते है!अब मेरी सहेली कहती है कि यह जो काले कोट में बैठे हैं यही मेरे पति हैं! मैंने अपनी सहेली से पूछा कि क्या तुम्हारे पति एडवोकेट है! मेरी सहेली ने कहा कि हां यह एडवोकेट है, और आगे उसने बताया कि यह अपना केस खुद लड़ रहे हैं! मैंने अपनी सहेली से पूछा की तुम्हारे पति के साथ यह बुजुर्ग महिला कौन आई है! मेरी सहेली ने उत्तर दिया मेरे पति की सास! मैंने अपनी सहेली से कहा कि कैसी उल्टी बातें करती हो तुम्हारे पति की सास तो तुम्हारी मम्मी हुई जो कि हमारे साथ में है!
फिर मेरी सहेली ने मुझे बताया कि यह उसके पति की दूसरी सास थी! मैंने अपनी सहेली से कहा कि अभी तो तुम्हारा तलाक हुआ नहीं है फिर अभी से दूसरी सास कोट तक कैसे आ सकती है ! मेरी सहेली का उत्तर था कि यहां सब कुछ हो सकता है जब मेरे पतिदेव मेरे होते हुए दूसरी शादी तक कर सकते हैं धोखे से तो सास का यहां होना कोई बड़ी बात नहीं है!मैंने कहा हां यहां हो तो कुछ भी सकता है!
अब मैं वहां बैठे बैठे अपनी सहेली से पूछ रही थी कि तुमने आगे क्या सोचा है!मेरी सहेली ने कहा कि तुम ही बताओ मेरे पति की दूसरी पत्नी से 5 साल की बेटी भी है! और वह पूरी तरह से उन्हीं के साथ रहते हैं! मैं तो सिर्फ नाम की पत्नी हूं समाज को दिखाने के लिए! मेरी सहेली मुझसे ही पूछ लेती है कि तुम बताओ क्या समाज को दिखाने के लिए इस रिश्ते को जिंदगी भर यूं ही चलाती रहूं, जिसमें मुझे यह कभी कुछ केस लगा कर कभी कुछ केस लगा कर परेशान कर रहे हैं ताकि मैं इनको छोड़कर अलग हो जाऊं!और तुम भी अच्छी तरह से जानती हो कि एक बार कोर्ट में केस चल जाए तो 5/7 साल से पहले कोई फैसला सामने नहीं आता है! और जिसमें मेरे पति तो खुद एडवोकेट है, सारे कानूनी दांवपेच जानते हैं कि किस तरह से एक महिला को मानसिक रूप से परेशान किया जा सकता है!
फिर मेरी सहेली का नंबर आता है जज साहब मेरी सहेली को बुलाते हैं, और आगे की कार्यवाही शुरू होती है मेरी सहेली के पतिदेव जो कि खुद एडवोकेट थे और अपना केस खुद लड़ रहे थे,ने अपनी माता जी से अपनी पत्नी पर घर से निकालने का केस कर रखा था यह पूरी प्रॉपर्टी हड़पना चाहती है माता जी की! थोड़ी बहुत कार्यवाही होती है और फिर आगे की डेट दे दी जाती है!
अब मैं मेरी सहेली और मेरी सहेली की मम्मी हम तीनों कोर्ट से बाहर आ चुके थे! मैंने अपनी सहेली से एक प्रश्न पूछा कि क्या तुम इस व्यक्ति के साथ पूरा जीवन बिताना चाहोगी, मुझे अपना उत्तर बिना डरे हुए देना समाज रिश्तेदारी और बाकी सब को छोड़कर! मेरी सहेली की आंखों में आंसुओं की धारा बह निकली थी और वह मेरे गले लग कर इतना रोई कि जैसे अभी कोई सैलाब आ जाएगा और सब को डूबा कर ले जाएगा! मेरी सहेली की मम्मी बेटी को चुप कराने की कोशिश कर रही थी और साथ में यह भी कह रही थी कि बेटी समाज हमें क्या कहेगा हमारी इज्जत तुम्हारे हाथों में है, हमारे संस्कार अलग होने के नहीं हैं साथ निभाने के हैं! यह शब्द सुनते ही मेरी सहेली फिर से टूट गई और मुझसे बोली कि यही मेरा जीवन है!
मैंने अपनी सहेली से कहा कि जब तक तुम अपने आप को दूसरों के हवाले रखकर फैसले लेती रहोगी, जब तक तुम गुलामी का जीवन जीती रहोगी, कभी समाज के नाम पर, कभी सनातन संस्कृति के नाम पर,कभी माता-पिता की इज्जत के नाम पर, और कभी महिला होने के नाम पर कि समाज तुम्हें क्या कहेगा!किसी गलत व्यक्ति के साथ रहना और अत्याचार सहन करना इसको घर बसाना नहीं कहते हैं,इसको समाज के द्वारा जबरदस्ती एक महिला को जीते जी मौत की सजा सुनाना कहते हैं, इसलिए अगर तुम्हें यह मौत स्वीकार है तो तुम खुशी से स्वीकार करो अगर तुम्हें यह स्वीकार नहीं है तो खुशी से अलग होना स्वीकार करो और खुशी खुशी अपनी जिंदगी जियो क्योंकि एक गलत व्यक्ति के चक्कर में हम अपना पूरा जीवन बर्बाद कर देते हैं सिर्फ दिखावे के लिए! इसलिए मेरा कहना मानो तो इस व्यक्ति से तलाक लो और जो तुम पिछले 15 सालों से गुलामी का जीवन जी रही हो उससे आजादी पाओ! और वैसे भी रिश्ते जबरदस्ती नहीं चलते हैं, वह व्यक्ति पिछले 15 सालों से तुम से तलाक लेने की भरपूर कोशिश कर रहा है लेकिन उस में दम नहीं है कि वह सबके सामने स्वीकार कर सके, कि तुम से तलाक लेना चाहता है! इसलिए तुम बहादुर बनकर सब से कहो कि मैं तलाक लेना चाहती हूं इस गंदे व्यक्ति से !बस यही शब्द मेरी सहेली के जीवन में नया सवेरा लेकर आ गए थे!
आज वही सहेली हजारों महिलाओं को गुलामी से आजाद करवा चुकी है, हजारों महिलाओं की ताकत बन चुकी है,हौसलों से भरी हुई है,जिसमें वह समाज और राष्ट्र का नाम रोशन कर रही हैं अपने उन्हीं संस्कारों से, बस जरूरत थी तो पहले खुद को आजाद कराने की गुलामी से!
लेखिका डॉ हर्ष प्रभा उत्तर प्रदेश गाज़ियाबाद समाज सेविका पर्यावरणविद एवं लेखिका
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