गुरु गोविंद सिंह जी फोटो फ्रेम को देखकर दीवार पर लटकाना गहरे नीले रंग की पोशाक में लंबा खड़ा कई हार पहने हुए गहनों से सजी पगड़ी कलगी खड़ी कंधे पर धनुष अनमोल नाम के घोड़े पर सवार, अनमोल उसके दाहिने हाथ पर सफेद बाज़ समर्पित सिखों के मन में छवि उकेरी गई सफेद बाज़ वाले सफेद बाज़ का रक्षक जैसा कि उनहे कहा जाता है

ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 22 दिसंबर 1666 को जन्म पटना, भारत में हुआ था नौ साल की उम्र में बने गुरु पिता की मृत्यु के बाद गुरु तेग बहादुर जी

एक योद्धा कवि और दार्शनिक पंथ खालसा के दसवें गुरु गुरु ग्रंथ साहिब को प्रतिष्ठित किया खालसा की प्राथमिक पवित्र पुस्तक

चौदह अप्रैल 1699 वैसाखी का दिन गुरु गोबिंद राय सिंह का नाम लिया शेर पंज प्यारे . बनाया पांच . की एक परिषद अमर अमृत को खालसा को पिलाने की दीक्षा उनकी पत्नी अजीत कौर खालसा पंथकी पहली महिला थीं

गुरु के हाथ में चित्त (सफेद) बाज़ शांति और पवित्रता के लिए खड़ा है बाज (बाज़) आसमान को चीरता है अपने दिमाग और आंखों को सबसे कम रखता है दृष्टि कम रखना नम्रता का इज़हार कोई अहंकार कविता नहीं है अपने शिकार को जमीन पर बिखेरता है खुद खाना पकड़ता है कभी किसी का दिया हुआ खाना नहीं खाता आत्मनिर्भरता बाज़ का स्वभाव है

हवा की विपरीत दिशा में उड़ना दबाव के खिलाफ बहती है स्वर्ग और आकाश तक पहुँचना आकाश को आज्ञा देना एक शाही रवैया लापरवाह प्रकृति बाज़ के पास

बाज़ को पिंजरे में बंद नहीं किया जा सकता स्वतंत्रता उसका जीवन है- आदर्श वाक्य कभी भी एक जगह पर ज्यादा देर तक नहीं रहना हमेशा सतर्क, कोई स्थायी घर नहीं हमेशा यात्रा अनासक्त, कोई धारण नहीं एक दिन हम सब इस दुनिया को छोड़ देंगे बाज़ और सिख दोनों साहस के प्रतीक कभी किसी से नहीं डरते आत्मनिर्भरता का महत्व फाल्कन अच्छी तरह से पंजों से सुसज्जित खालसा ने दी गुरु कृपाण, तलवार कमजोरों के सम्मान की रक्षा करें तानाशाह को नष्ट करो कोई झूठा अहंकार आत्मनिर्भरता नहीं स्वतंत्रता और विनम्रता अनासक्त, लापरवाह ताकत और चपलता मेहनती और बड़प्पन सिख संस्कृति ने कायम रखी नाम-पहचान बड़प्पन के सभी गुणों के लिए अवतार लिंग की परवाह किए बिना, नस्लीय पहचान आर्थिक और सामाजिक समानता

दशम ग्रंथ के लेखक संहिताबद्ध सिख कानून मार्शल कविता लिखी घोषित किया कि वह अंतिम गुरु है अगला गुरु है होली की किताब गुरु ग्रंथ साहिब

लंगर की संस्था साथ ही शहादत (शहादत) मानवता की भावना सर्वत दा भला

355 वें प्रकाशोत्सव पटना पे सत् श्री अकाल कहती मेरी कविता..

एक अकाल , एक ओंकार , एक नानक ध्यान जगाएँ हम गुरु गोविन्द , के जन्म का , उत्सव आओ यहाँ मनाएँ हम !!

नहीं डरें और नहीं डराएं , जीवन -प्रीत, जगाएँ हम कठिन परिश्रम जीवन करके गुरु- शिक्षा, जी आएँ हम !!

आडंबर से मुक्ति ले , सम्बन्ध सुरीत जोड़ आएं हम कर्मठ बन कर जीवन के गीतों को एक सुर गाएँ हम !!

गुरुनानक ने सिक्ख धर्म की राह नई दिखलाई थी सब जातों औ धर्मों से एक प्रेम भाव सिखलाई थी !!

अपने शब्द औ दोहों से चैतन्य जगत फैलाई थी भेदभाव औ शोषण से मुक्ति की चाह जगाई थी !!

गुरुनानक के बाद वो अंगददेव गुरु कहलाये थे गुरुमुखी लिपि औ वो लंगर वो ही शुरू कराये थे !!

अमरदास औ रामदास तब गुरु की गद्दी पाए थे अमृतसर वो शहर बसा कर ,सिक्ख ज्योत फैलाए थे !!

अर्जुन देव थे पंचम गुरु , वो आदि ग्रन्थ लिखवाए थे अमृतसर में स्वर्ण वो मंदिर , नींव डाल वो आए थे !!

गुरुओं औ भक्तों की वाणि एक ग्रन्थ समाई थी चाहे दोहे हों कबीर या जयचंद राग सुनाई थी !!

हों फ़रीद या नामदेव , धन्ना के शब्द पिरोई थी सन् सोलह सौ चार में गुरु वाणी प्रकाश में आई थी !!

चौदह सौ औ तीस पेज़ के गुरु ग्रन्थ पढ़ आएं हम निर्गुण कवियों की वाणी को एक साथ सुन आएं हम !!

हरगोविंद गुरु ने अकाल ये तख़्त की नींव रखाई थी ‘दाता -बंदी-छोड़’, कहाकर सिक्ख लहर फैलाई थी !!

गुरु हर राय ने 14 वर्ष में सप्तम् गुरु पद पाई थी चार फेरों में शादी रीत गुरु राम दास चलाई थी !!

8 साल की उम्र में अष्टम् गुरु हर किशन कहाए थे दीन – दुःखी की सेवा करते वीर गति को पाए थे !!

नौवें गुरु थे तेग बहादुर , शौर्य बड़ा दिखलाए थे बलिदान कर अपना सर वो धर्म की आन बचाए थे !!

तब दसवें गुरु बनकर गुरु गोविन्द जी धर्म बचाए थे जन्में पटना , छह वर्षों तक यहीं पे शिक्षा पाए थे !!

पिता पुत्र को खो कर ख़ुद को वो शहीद कर आए थे धर्म – क़ौम की रक्षा को सर्वश्व त्याग वो आए थे !!

तैंतीस वर्षों तक गद्दी पर गुरु गोविन्द रह आए थे अपने बाद वो ग्रन्थ साहिब को अगला गुरु बताए थे !!

खालसा पंथ की पहली दीक्षा पंच प्यारे दे आए थे खंडे बाट की पाहुल दे कर राह नई दिखलाए थे !!

दशम् ग्रन्थ की रचना करके कवि गौरव बन आए थे नांदेड़ में लड़ते – लड़ते, वीर गति को पाए थे !!

कंघा , कच्छा , कड़ा व तलवारों को साथ में लाएं हम खालसा बन के गुरु फ़तह को साथ पांत में आए हम !!

सब जातों औ धर्मों के संग एक संगत कर आएं हम ‘क्रांति’, सेवादार वो बनके ,गुरु लंगर कर आएं हम !!

गुरु – ग्रंथ है , गुरु की वाणी , मिलकर ध्यान लगाएँ हम सभी सुखी हों , सभी स्वस्थ हों , एक अरदास लगाएँ हम !!

एक अकाल , एक ओंकार ,एक नानक ध्यान जगाएँ हम गुरु गोविन्द के जन्म का उत्सव , आओ यहाँ मनाएँ हम !! ________________________क्रांति

दोस्तों , विगत रविवार को अहले सुबह मैं पटना कॉलेज के गंगातट पर जाने के लिए मैं अपने आवास राजा बाजार पटना से निकला तो रास्ते में गाँधी मैदान पटना में श्री श्री गुरु गोविन्द जी महाराज के 355 वें प्रकाशोत्सव की तैयारी का सुन्दर नज़ारा और टेंट देखकर मन एक अपूर्व गर्व और अभिमान से भर गया की आज़ बिहार को पूरी दुनियां के सिक्ख कौम के ख़ैर मकदम का सुअवसर प्राप्त हुआ है जिसे हमारे माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी ने बड़े ही संजीदगी से लिया है !! यह सब देखकर मन नानक ध्यान में डूब गया और उन निर्गुण कवियों की वाणियों को याद करने लगा और फ़िर वही हुआ जिसका डर था … आज न जाने कैसे मेरी गाड़ी पटना कॉलेज की ओर न मुड़कर अशोक राजपथ पर आगे का रुख ले ली !! अब मैं श्री हरमंदिर साहिब पटना साहिब जा रहा था .. फिर पता नहीं चला कब तक मैं हरमंदिर साहिब मंदिर में पहुंचकर गुरु वाणी सुनता रहा … फ़िर क्या था … वहीं एक कोने में बैठ यक-ब-यक उँगलियाँ चलने लगी … जब रुकी तो ये कविता बारास्ता मेरे हाथ , मेरे दिल से निकल उस मुड़े जुड़े कागज़ पे अपना अस्तित्व बना चुकी थी ..,, तो सोचा 355 वें प्रकाशपर्व पे आप सबों को शुभकामनायें भेजते हुए इस कविता को आप सबों से साझा करूँ और अपने इन गुरुओं की याद ताज़ा करूँ .., बोले सो निहाल !! सत श्री अकाल !!

@मेरी कविता _डॉ क्रांति चन्दन जयकर , होलिस्टिक हेल्थ एक्सपर्ट (समग्र स्वास्थ्य विशेषज्ञ) सह- प्राध्यापक पूर्व एवं प्रथम विभागाध्यक्ष (प्रभारी)

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