विवाहों के इस समय कई जगहों से कार्यक्रम के बाद वापस घर आते समय बायना लेकर आना हुआ ,हलवाई के हाथों बने खस्ते , बालूशाही ,माठ, लड़ुआ , पुआ , गुझिया और मैदे की पूड़ी आदि ,, बच्चों की जिज्ञासा ये जानने की हुई कि जब फंक्शन से खा पीकर निकलते हैं तो इसका क्या मतलब है ?
आज के परिवेश में बाकायदा इसको परिचर्चा का विषय माना जाए । अपने बड़ों से ज्ञात हुआ सनातन संस्कृति में , पुराने समय में किसी घर की महिलाएं गृहकार्य में कैसी होंगी ये परखने तथा मार्ग यदि लम्बा हो तो रास्ते में भूख मिटाने के लिए बायना का चलन हुआ था ,, रास्ते वाली बात तो प्रैक्टिकल लगी क्योंकि तब विवाह के लिए आज की तरह यातायात साधन नहीं थे ,, बैलगाड़ियों से बारातें जाया करती थीं जिसकारण जाने और आने में काफी समय खर्च होता था , इसलिए उन लम्बे रास्तों में ,, इन बायना से भरी टोकरियाँ ही सहारा रहती होंगी ,,, फिर जिज्ञासा हुई कि लड़की के घर की महिलाओं को बायना से कैसे परखा जाता होगा ,,, बड़ों ने बताया कि पहले बारात चार से पांच दिन रुका करती थीं क्योंकि एक दूरी तय कर के आने के बाद थकान हो जाती थी थकान उतार कर विवाह के कार्यक्रम ,, और उसके बाद पूर्णतयः रिलैक्स होकर वापसी की यात्रा ,, जिसमे चार से पांच दिन लग जाना साधारण बात होती थी ,,,,, उसी दौरान बारातियों की संख्या के अनुसार ,, मैदे की पूड़ी (क्योंकि मैदे की पूड़ियाँ जल्दी खराब नही होती हैं और यात्रा के लिए अधिक समय तक सही बनी रहती हैं ) , पानी पीने के लिए गुड़ के सेव के लड्डू , अधिक मोयन वाले पुआ ,गन्ने के रस से माड़े हुए बाजरे के खाजा सहित ऐसी खाद्य सामग्री रखी जाती थी जो जल्दी खराब न हो ,,, यदि वो सामग्री रास्ते में ही खत्म हो जाती थी तो माना जाता था कि लड़की का मायका या तो कंजूस प्रवत्ति का है या आर्थिक रूप से कम सक्षम और कम सामाजिक है ,, बचकर आने वाली सामग्री से ये अनुमान लगाया जाता था कि घर आई लड़की कैसा खाना बना सकती होगी और उसी आधार पर घर की बड़ी औरतें डिसीजन लेती थीं कि नवविवाहिता को इस घर के लिए कैसे ट्रेंड करना है ,, क्योंकि तब दोनो घरों की महिलाओं को एक दूसरे के बारे में बहुत कम जानकारी प्राप्त हो पाती थी ,,,, और फिर उस बचे हुए बायना को पूरे मोहल्ले में बंटवा दिया जाता था ,,,, बायना रास्ते में ही खत्म हो जाने पर लड़के पक्ष द्वारा अपनी प्रतिष्ठा के लिए अपनी तरफ से घर की महिलाओं द्वारा चुपचाप बायना बनवा कर बंटवाया जाता था ,,,
बड़ी रोचक जानकारी मिली ,,,, तो इतना प्रैक्टिकल है अपना सनातन धर्म ,,, परन्तु हमने धर्म के मूल को समझे बिना “हमाये यहां ऐसेइ होत है” की लकीर को परम्परा मान बैठे ,,, और उस लकीर को पीटने के लिए बायना के नाम पर हलवाई से बनवाकर सुंदर अकर्सित पैकिंग के साथ समोसा बिस्किट अंकल चिप्स और चॉकलेट रखकर बायना बांटने लगे ,,, और ऐसा हो भी क्यों न ,क्योंकि अब महिलाएं भी तो चॉकलेट हो चली हैं अजेय शुक्ला लेखक कानपुर सूत्र फेसबुक वॉल
Tagged in : #CM-UP #CMbhupeshbaghel #CMUK #CMUP #congress #covid19#MPC#mudra #crime #crime #police #crime #police #अपराध #डकैती #dipawali