आत्माराम त्रिपाठी की✍🏻से

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश से माफी मांगते हुए तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लिया है कुछ विश्लेषक इस फैसले को भाजपा की राजनीतिक मजबूरी मानते हैं तो कुछ इसे मोदी का मास्टर स्ट्रोक मानते हैं। इस फैसले के नापा व नुकसान के अलग-अलग गणित है आंदोलनकारी इसे अपनी जीत के रूप में देख रहे हैं तो सरकार इसे राष्ट्रहित में मान रही है। कृषि कानूनों की वापसी के निहितार्थ जो भी हो लेकिन भारत में कृषि सुधार का प्रश्न शेष ही रह गया है देश में कृषि क्षेत्र का संकट 60 के दशक से चला आ रहा है इसके समाधान की दिशा में उठाए गए कदम या तो ना काफी रहे हैं यह कदम पीछे खींचने पड़े हैं। लगभग 1 वर्ष तक शाब्दिक युद्ध के बाद प्रधानमंत्री ने क्षमा मांगते हुए किसानों से अपनी बात कही पिछले 1 साल में किसानों उनके पीछे की ताकतों और नीतियों को निशाना बनाया गया प्रधानमंत्री ने स्वयं उनके नेताओं को आंदोलन जीबी बताया किंतु आज वह सब भुलाते हुए उन्होंने यह पहल की जो स्वागत योग है इसलिए नहीं कि यह कानून गलत है बल्कि इसलिए कि इस विषय पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए भविष्य में जब भी इस विषय पर विचार हो तो अच्छी तरह इसके सभी पहलुओं को स्पर्श किया जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर चौका दिया है बीते शुक्रवार की सुबह 9:00 बजे उन्होंने अचानक देश को संबोधित किया और तीनों कृष्ण कानून वापस लेने की घोषणा की प्रधानमंत्री ने सच्चे मन और पवित्र है जैसे हाथ जोड़कर देश से माफी मांगी और कहा कि दिए के प्रकाश जैसा सत सरकार कुछ किसान भाइयों को समझाने में विफल नहीं लिहाजा कानून रद्द करने का निर्णय लिया गया है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बाद मोदी दूसरे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से देश से माफी मांगी है अलबत्ता दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तो पवित्र स्वर्ण मंदिर के भीतर साइन हमले का आदेश दिया था पवित्र गुरुद्वारे और अकाल तख्त के पास बहुत कुछ अपवित्र कर दिया गया था 1984 में सिखों का जो नर संघार किया गया था उस पर भी सिख प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने संसद में सिर्फ खेद व्यक्त किया था। देश के प्रधानमंत्री के माफी 9 को सिर्फ चुनावी भय से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए ‌। बेशक विपक्ष कुछ भी व्याख्या करें लेकिन यह कोई सामान और सतही घटना नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी एक लंबे अंतराल से अपने किसान और कृषि सलाहकारों के साथ विचार विमर्श कर रहे थे आशिक परिषद के सदस्यों की भी सलाह दी गई यह खबर भी आई कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य में एमएसपी को कानूनी दर्जा देने पर गंभीर मंथन कर रही है ‌ इसके संकेत तक नहीं थे कि प्रधानमंत्री तीनों कृषि कानूनों को खारिज करने का फैसला भी ले सकते हैं। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में किसानों पर भी खूब चर्चा की गई लेकिन कानूनों और आंदोलनों पर कुछ भी सटीक टिप्पणी नहीं की गई थी बहन हाल अब यह घोषणा की जा चुकी है संसद का शीतकालीन सत्र 29 नवंबर से शुरू हो रहा है कानूनों की वापसी की संवैधानिक प्रक्रिया संसद के भीतर ही संपन्न होगी यह प्रधानमंत्री भी आश्वस्त कर चुके हैं। अब सवाल यह है कि क्या यह निर्णय प्रधानमंत्री और भाजपा की चुनावी मजबूरी है अथवा इसे मास्टर स्ट्रोक माना जा सकता है ? क्या अब किसान आंदोलन भी समाप्त होना चाहिए और किसान अपने घरों और खेतों को लौट जाएं ? क्या प्रधानमंत्री ने यह घोषणा कर विपक्ष का असरदार मुद्दा छीन लिया है ? अब किसानों में भी विभाजन की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि 80 फ़ीसदी किसान इन कानूनों के खिलाफ आंदोलित नहीं थे। प्रधानमंत्री ने माफीनामा और कानून वापस लेने का दिन गुरु नानक देव के 552 वें प्रकाश पर्व को चुना सिख गुरु बाबा को लेकर बेहद भाउक है। इसका साधुवाद प्रधानमंत्री के हिस्से भी आ सकता है क्योंकि उप्र और उत्तराखंड में भी चुनाव 2022 में ही होने हैं खासकर उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से के जाट किसान आंदोलन से जुड़े रहे हैं लिहाजा हुए प्रधानमंत्री और भाजपा से नाराज हैं। 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से भाजपा को भरपूर समर्थन मिला था अब वह प्रधानमंत्री के खिलाफ है। इसी दौरान उत्तर प्रदेश के तराई इलाके में लखीमपुर खीरी कांड हो गया उस इलाके को मिनी पंजाब कहते हैं क्योंकि विभाजन के बाद इस इलाके में सिख आ बसे थे और उन्होंने व्यापक स्तर पर खेती की लिहाजा उत्तर प्रदेश के सिख वोट बैंक भी बेहद महत्वपूर्ण है। चुनावी हवा यहां भी पूरी तरह अनुकूल नहीं है लेकिन मुकाबले कई दलों में होंगे लिहाजा वोट बांटने का लाभ मिल सकता है। बेशक तीनों कानून वापस ले लिए जाएंगे लेकिन किसान और कृषि संकट के मुद्दे बरकरार रहेंगे।यह नीति आयोग की रपट है कि देश के 17 राज्यों में किसान की औसतन सालाना आय करीब ₹20000 है किसान पर 68 कर्ज ₹74000 से अधिक है सरकार के एनएसएसओ के आंकड़े खुलासा कर चुके हैं कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी नहीं हो सकती लिहाजा सरकार एमएसपी का गारंटी कानून बनाकर आर्थिक सुधार करने के पक्ष में हैं यदि किसान की फसलें एमएसपी पर बिकना तय हो जाएगी और किसानों को लाभकारी मूल्य मिलने लगेगा तो उससे बाजार में मांग बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था में भी बढ़ोतरी होगी किसान की आत्महत्याओं का मुद्दा भी बेहद नाजुक रहा है ‌। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के दिसंबर 2020 तक आंकड़े खुलासा करते हैं कि इस साल 10677 किसानों ने आत्महत्या की उनमें 69 फ़ीसदी गरीबी रेखा के नीचे वाले किसान थे। बहरहाल कानून वापसी की घोषणा के बावजूद किसान आंदोलन अभी जारी रहेगा आंदोलित चेहरों की मांगों की सूची लंबी होती जा रही है उनकी सियासत भी स्पष्ट है क्योंकि वह प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा में भी साजिश की बू सूंघ रहे हैं।यह स्वतंत्र भारत का सबसे लंबा किसान आंदोलन रहा है लेकिन आंदोलन को गरीब और छोटे किसान की दुर्दशा और शोषण पर भी चिंता जताते हुए सारोकार स्पष्ट करनी चाहिए। पिछले 7 साल में पार्टी की इस किस्म की ये तीसरी पराजय है इसके पहले भूमि सुधार कानून में संशोधन और जजों की नियुक्ति से जुड़े न्यायिक नियुक्ति आयोग के मामले में सरकार को पीछे हटना पड़ा था इतना ही नहीं सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन तो संसद से पास करा लिया और उससे जुड़े नियम अभी तक नहीं बना पाई है। उसे लेकर वैश्विक और आंतरिक राजनीतिक दबाव है बहरहाल संयुक्त किसान मोर्चा ने कानूनों की वापसी को किसानों की ऐतिहासिक जीत बताया है यह भी कहा है कि आंदोलन फसलों के लाभकारी दान की वैधानिक ग्रंथि के लिए भी था जिस पर अभी कुछ फैसला नहीं हुआ है अब हम संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से घोषणा के प्रभावी होने तक इंतजार करेंगे इन कानूनों को वापस लेने की प्रक्रिया भी वही है जो कानून बनाने की है सांसद को विधायक पास करना होगा।

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