संपादकीय लेख -आत्माराम त्रिपाठी
आज गिद्ध देखते देखते दृष्टि से ओझल हो गये है ।यह वह पक्षी थे जो दूर गगन में अपने पंख फैलाए हुए विचरण करते हुए जमीन में पड़ी हुई निर्जीव दुर्गंध युक्त देह को अपने नुकीले पंजों दांतों से काट कर अपना ग्रास बनाते हुए उस जगह को प्रदूषण को नियंत्रण करने में सहायक साबित होते थे। आज जंहा दुर्घटना ग्रस्त जानवर हो या स्वाभाविक मौत से मरे हुए जानवर जिन्हें उनके अभिभावकों द्वारा दफनाया नहीं जाता बल्कि उन्हें आम मार्ग पर फेंक दिया जाता है जिसमें उनसे उठने वाली दुर्गंध से संक्रामक बिमारियों का खतरा पैदा हो जाता है को यह चट कर जाते थे और मानव समाज को एक अनजान बिमारियों के भय से मुक्ति दिलाने में मददगार साबित होते थे। पर आज यह प्रजातियां लुप्त हो रही है हम हमारा सभ्य समाज मौन है। आज से चार पांच दसक वर्ष पहले तक यह पक्षी दिखाई देता रहा है इसके बाद अहिस्ता अहिस्ता बिलुप्त होने लगा लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश भी नहीं की यह गगन में विचरण करने वाले दुर्लभ प्रजाति के प्राणी गगन एवं धरा से क्यों लुप्त हो गयें किधर पलायन कर गए वह कौन से कारण हैं जो मानव समाज के लिए हितकारी थे किंतु पलायन करने को बाध्य हो गए वायुमंडल में फ़ैल रहा प्रदूषण य उनकी जगह को अतिक्रमण करता यह मानव समाज आखिर इसके लिए दोषी कौन है ? जवाब की तलाश में निकला हूं लेकिन अभी तक कहीं से जवाब नहीं मिला। हां चारों तरफ स्वच्छता का नारा लगाया जा रहा है झाड़ू लगाई जा रही है पर मन ,बिचारो में भरी गंदगी को साफ स्वच्छ करने की जहमत कोई नहीं उठा रहा सभी अंधे हैं नगर हो या गांव जगह जगह रोड किनारे मूक जानवरों के दुर्गंधयुक्त शव ,घरों से निकाल कर फेंका हुआ कचड़ा दिखाई देता है जिससे संक्रामक बिमारियों का उत्पादन होता जी हां इसे हम उत्पादन ही कहेंगे क्योकी इन्ही गंदगियों से संक्रामक बिमारियों का जन्म होता है जो अंत में जानलेवा साबित होता है और हम इन खतरों को जानते हुए भी अनजान बनजाते है साथ ही उन मददगारों से मुख फेर लेते हैं जो हमें इनसे निजात दिलाने है। ऐसे न जाने कितने पक्षी है जो हमारी फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों से बचाते हैं पर वह सब लुप्त हो रहें हैं और हम मौन है।
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