सम्पादकीय
आत्माराम त्रिपाठी लेखक देश में भूख से जूझती आबादी तक खाना पहुंचाने की स्कीम को लेकर मंगलवार को दिखा सुप्रीम कोर्ट का सख्त रवैया समझा जा सकता है। कोर्ट ने पिछली सुनवाई में ही केंद्र सरकार से कहा था कि राज्यों के साथ मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर कम्युनिटी कीचेन इस स्कीम की रूपरेखा तैयार की जाए मंगलवार को केंद्र सरकार की ओर से अदालत में पेश किए अलापना में में प्रस्तावित स्कीम को लेकर ऐसी कोई नई सूचना नहीं थी जिससे पता चलता कि उस दिशा में कितनी प्रगत हुई है।
दूसरी बात यह है की हलफनामा भी अंदर से कैटरी लेवल के अधिकारी ने दायर किया था जबकि सुप्रीम कोर्ट का पहले से ही निर्देश है कि सेक्रेट्री लेवल के अधिकारी से ही हलफनामा दायर करवाया जाए। स्वभाविक ही इससे कोर्ट को ऐसा लगा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे को पर्याप्त तवज्जो नहीं दे रही है सवाल कोर्ट के सम्मान का भी था बाहर हाल इन तकनीकी सवालों से हटकर देखें तो किसी भी सभ्य समाज में यह स्थित बर्दाश्त नहीं की जा सकती कि वहां किसी नागरिक के भूख से मरने की नौबत आ जाए सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल ठीक कहा कि कोई भी संवैधानिक व्यवस्था नियम कानून या संस्था इसके आगे नहीं आ सकती बावजूद इसके अपने देश में आज भी आबादी के एक हिस्से के सामने दो वक्त भरपेट भोजन पाने की चुनौती बनी हुई है कोरोना महामारी से उपजी स्थितियों ने हालात को और बदतर बनाया है बड़े पैमाने पर आजीविका के संकट से वंचित हुए लोगों में बहुत से ऐसे हैं जिनका पुराना काम फिर से शुरू नहीं हो पाया है। फिर भी यह तक अपनी जगह है कि देश की आबादी के एक हिस्से की हालात वाकई खराब है और उस तक समय पर भोजन पहुंचाने की व्यवस्था जल्द से जल्द होनी चाहिए पर यह सवाल अभी पता रहता है कि इस का सबसे अच्छा तरीका क्या हो सकता है सुप्रीम कोर्ट में भी यह बात आई है कि कई राज्यों में मिलती जुलती थी इसकी में पहले से चल रही हैं फिर यह भी है कि हर राज्य की सामाजिक आर्थिक स्थिति भिन्न हैं ऐसे में पूरे देश के हर जरूरतमंद के पास समय पर भोजन पहुंचाने का संकल्प को पूरा करने का बेहतर तरीका शायद यही होगा कि केंद्र इसके लिए जरूरी फंड उपलब्ध कराने में जरूर सहयोग करें लेकिन स्कीम का स्वरूप तय करने का काम आखिरकार राज्यों पर ही छोड़ दिया जाए। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि आजादी के 75 साल बाद भी हमारे देश में भूख से दो-चार लोगों की त्रासदी पर आदलतों को निर्देश देना पड़ रहा है। हैरानी की बात यह है कि जिस समस्या से लड़ना और उसे खत्म करना सरकार की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए थी आज भी वह इस मसले पर सवालों के कटघरे में खड़ी है। यह हालात तब जब देश में सरकार की बुनियाद ही लोक कल्याणकारी सिद्धांतों पर टिकी हुई है लेकिन आंकड़ों से लेकर जमीनी तस्वीर तक यह बताती है कि भूख से मौतों को लेकर सरकार एक इतनी फिक्र मंदिर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ लहजे में कहा कि भूख से एक भी मौत ना हो यह सुनिश्चित करना एक लोक कल्याणकारी सरकार का दायित्व है हो सकता है कि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए फिर से मौजूदा या नए उपायों पर काम करने की बात करें लेकिन क्या सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक लोकतांत्रिक सरकार को असहज करने के लिए काफी नहीं है ? अदालत ने केंद्र सरकार को अंतिम अवसर के रूप में विभिन्न राज्य सरकारों से विचार विमर्श कर सामुदायिक रसोई पर अखिल भारतीय नीति तैयार करने के लिए 3 सप्ताह का समय दिया जाहिर है सामुदायिक रसोई जय श्री व्यवस्था उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत साबित हो सकती है जो किन्ही वजहों से अपना और अपने परिवार का पेट भर पाने में नाकाम होते हैं। अगर ऐसे लोगों के पास आय का नियमित जजिया हो तो शायद उन्हें महज भूख मिटाने के लिए किसी व्यक्ति या सरकारी कार्यक्रम पर निर्भरता की जरूरत नहीं पड़ेगी। अदालत ने सरकार के लिए यह उचित टिप्पणी की है कि अगर आपका ख्याल रखना चाहते हैं तो कोई संविधान कोई कानून आपको मना नहीं करेगा। विचित्र बात यह है कि जब इस मसले की गंभीरता की ओर ध्यान दिलाया जाता है तब अक्सर सरकार आनन-फानन में कुछ चिन्हित तबको के लिए सीमित अवधि के खातिर अनाज वितरण के किसी नए कार्यक्रम की घोषणा कर देती है। लेकिन समस्या की जड़ों के तौर पर भूख से दो-चार लोगों और समूहों के लिए नियमित रोजगार और आय के अभाव के बारे में सोचना और उसे दूर करने को लेकर कोई खास उत्साह नहीं दिखता। जबकि औपचारिक महत्त्व की आधी अधूरी पहल कदमी के नतीजे समस्या के दीर्घकालिक और ठोस समाधान नहीं हो सकते। अदालत में अटॉर्नी जनरल ने यह आश्वासन दिया कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के ढांचे के भीतर कुछ काम किया जा सकता है और अदालत ने भी इससे सहमत जताई की योजना के लिए वैधानिक ढांचा होना चाहिए, ताकि नीति में बदलाव पर इसे बंद नहीं किया जा सके।यह ध्यान भी रखने की जरूरत है जब तक राज्यों को किसी भी योजना में शामिल नहीं किया जाता है तब तक किसी योजना के अमल में कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती सवाल यह है कि नागरिकों को भोजन का अधिकार देने वाले कानून के लंबे समय से लागू होने के बावजूद आज भी देश में भूख से होने वाली मौतें चिंता का विषय क्यों बनी हुई है। दरअसल अब तक सरकारों का जो रुक रहा है अगर उस पर गौर किया जाए यह समझना मुश्किल नहीं रह जाता है कि भूख से मौतों की समस्या देश में अनाज संसाधनों की कमी की वजह से है या फिर यह सरकारों की इच्छा सक्ति और अदूरदर्शिता का नतीजा है। सरकार को यह सोचना होगा कि आखिर किस वजह से कुपोषण के मामले में बदतर हालात में होने के साथ-साथ वैश्विक भुखमरी सूचकांक में हमारा देश 116 देशों की सूची में 101 स्थान पर क्यों है ?
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