दीपदान में भी थमते जा रहें कुम्हारों के चाक आत्माराम त्रिपाठी की✍🏻से आज जब दीपदान दीपावली का पावन पर्व नजदीक आ रहा है वहीं इस पर्ब में मिट्टी के दीपक बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के चेहरों में मुस्कराहट की जगह मयूसी ने डेरा जमा लिया है। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा होता जा रहा है। जिस पहिए पर मिट्टी को आकार दिया जाता था वह थमता जा रहा है और उनके सामने पलायन करना मजबूरी हो गया है। दरअसल मिट्टी से बने बर्तनो की मांग कम होने से यह संकट खड़ा हो गया है।
दीपावली के पर्व में भी लोग मिट्टी के दिए का उपयोग कम करते हैं जिससे इस कला में माहिर निपुण लोग बेरोजगारी की मार झेलने को मजबूर हो गए हैं। यह समास्या एक जनपद प्रदेश की नहीं है अपितु पूरे देश की है। कुछ वर्षों पहले तक कुम्हारी कला में माहिर लोगों द्वारा निर्मित दिए,बर्तनो की समय समय पर भारी मांग होती रही जिसके चलते यह अपने परिवार का भरण-पोषण करते रहे।यह लोग मिट्टी से खिलौने बर्तन, कुल्हण, सहित अन्य सामान बना उन्हें बेच आराम से अपनी जीविका चलाते थे। लेकिन अहिस्ता अहिस्ता दूसरी सामाग्री से बनी वस्तुओं ने बाजार में अपनी जगह बना ली जिससे इनका रोजगार छिन गया और आर्थिक संकट की स्थिति पैदा हो गई। इस व्यवसाय में देस के अंदर गिने चुने लोगों द्वारा ही इस कार्य को किया जा रहा है जबकी इनके परिवार की युवा पीढ़ी ने इस व्यवसाय से दूरी बना रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की तरफ पलायन कर दिया है । दीए की जगह कैडिंल,कुल्हण , सुराही,की जगह डिस्पोजल दोना ने ले लिया है जिससे इनके व्यवसाय में बुरा असर पड़ा।
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