संपादकीय – लेखक आत्माराम त्रिपाठी आज एक बार फिर दहशतगर्दी कब है उत्तर प्रदेश और बिहार के इन मजदूरों को जो कश्मीरी लोगों को केवल अपना सस्ता शर्म बेच रहे थे और राज खुशहाल होने लगा था पलायन को मजबूर कर रहा है उनका भय कोरे वादों से खत्म नहीं होगा।और क्या यह केंद्र सरकार की ही नहीं भारत की भी सबसे बड़ी हार नहीं होगी हालांकि सरकार को दिक्कत समझी जा सकती है सत्य यानी आतंकवादियों को पहचानना मुश्किल है क्योंकि वह या तो उसी समाज से हैं या बाहर से आकर उसने घुल मिल गए हैं और समाज डर के मारे उन्हें अलग नहीं कर पा रहा है। बॉर्डर पर लड़ना और अपने लोगों में ही चुके आतंकियों से लड़ना नितांत अलग-अलग ऑपरेशन है पिछले 2 वर्षों में उद्योग लगाने व्यापार का माहौल तैयार करने में वहां के उपराज्यपाल ने अहम भूमिका निभाई है और पाक समर्थित आतंकी इस से घबरा गए यह हमले भी उसी के प्रतिफल हैं लेकिन अब समय आ गया है जब सुरक्षा बलों को खुली छूट दी जाए हर उस उपक्रम की जिसमें आतंकवादियों को चूहे की तरह बिल से निकाला जा सके स्थानीय लोगों को अगर भरोसा हो जाए कि सास्वत रूप से सरकार सफल होगी तो वह भी स्थाई शांति के लिए आतंक के खिलाफ तन कर खड़े होंगे।

दो दशक पहले तक स्थानीय और बाहरी आतंकियों के डर से लाखों कश्मीरी ब्राह्मण अपना सब कुछ छोड़कर खानाबदोश जीवन जीने को मजबूर कर दिया गए थे उस समय भी यह शब्द समाज संवैधानिक सरकार और कानून के राज मुंह पर एक तमाचा था।

तब हम सब देखते रहे 2 साल पहले कश्मीर को लेकर संविधान बदला गया और केंद्र को नियंत्रण की शक्तियां मिली। तर्क था की विशेष राज्य का दर्जा कश्मीर में आतंकवाद को कम करना तो दूर बढ़ाता रहा है और हिंदुओं को घाटी से भागने पर मजबूर करता रहा है अब जब केंद्र पूरी तरह से नियंत्रण कर रहा है क्या यह बर्दाश्त किया जाना चाहिए कि आतंकी चुन-चुन कर गैर कश्मीरी मजदूरों या कश्मीरी हिंदुओं का नाम पूछ पूछ कर उन्हें मारे। आज स्थिति यह बन रही है कि धरा के जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर से श्रम यानी मजदूरों का पलायन हो रहा है जिसे किसी भी स्थिति में शुभ नहीं माना जा सकता इसे रोकना होगा इसके लिए भारत सरकार को अपनी रणनीति बदलनी होगी आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम बढ़ाने होंगे यही समय की मांग है।

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