माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा आपने सारे शहर का गला घोट दिया अब आप अदर आना चाहते हो। इस प्रकार की टिप्पणी की अपेक्षा आपसे कतई नहीं थी न्यायमूर्ति।

रास्तों का सच आपके सामने हैं..! SC रास्ते किसान ने रोक रखे हैं या सरकार ने रोक रखे हैं.. किसान शांतिपूर्वक धरना दे रहे हैं उनको बदनाम करने की कोशिश ना करें 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻#ModiRuined_FarmersFarming pic.twitter.com/AXM4AGIDIc

— Kisan It Cell (@kisanItcell1) October 2, 2021

आदरणीय न्यायमूर्ति आप किसान आंदोलन को पहले दिन से देख रहे हैं और उनकी बात सुन भी रहे हैं। उसके बाद भी आप ऐसा कह रहे हैं तो हैरानी हो रही है। आप मानते हैं शांतिपूर्ण प्रदर्शन एक संवैधानिक अधिकार है। किसान भी पंजाब और हरियाणा से शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली के लिए चले थे और स्पष्ट कहा था दिल्ली में काले कानूनों के विरोध में धरना देकर अपना विरोध दर्ज करेंगे। लेकिन हुआ क्या। हरियाणा में उनका स्वागत सर्दी के मौसम मे ठंडे पानी की बौछार और लाठियों से हुआ और ये स्वागत दिल्ली बार्डर तक बदस्तूर जारी रहा। तब आपने इस दमनकारी सरकार से तो नही कहा कि इन पर ये जुल्म क्यों। किसानो ने कभी दिल्ली की सीमाओं को बाधित नहीं किया। किसान दिल्ली में किसी एक स्थान पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहते थे लेकिन दिल्ली पुलिस ने उनके रास्ते रोक लिए। जहाँ किसानो को रोका गया वो वही बैठ गए। आज भी रास्ते पुलिस ने रोक रखे हैं किसानों ने नहीं। शहर का गला आपकी पुलिस ने घोंट रखा है। दस महीने होने को आए, हजार के लगभग किसान शहीद हो गए, सर्दी,गर्मी, बरसात और आंधी तुफान झेले लेकिन कभी हिंसा नहीं की। किसी ने खालिस्तानी कहा, किसी ने आंदोलनजीवी तो किसी ने उग्रवादी फिर भी नहीं बोले। इतना सब होता रहा लेकिन आपके कान पर जूँ नहीं रेंगी। आपने सरकार से कभी नहीं पूछा कि इतने लोग आप के दरवाजे पर जान दे रहे हैं क्या कारण है। आपने कभी इन किसानो का संयम नहीं देखा इनका आचरण नहीं देखा। कोरोना महामारी के दौरान अपने को विषम परिस्थितयों में भी बचा कर रखा। जब सरकारों ने कोरोना के सामने घुटने टेक दिए थे तब भी कम संसाधनों के बावजूद इन्होने अपने को बचा कर रखा। ऐसा तो हो नहीं सकता आप इन तथ्यों से अंजान हों। आदरणीय न्यायमूर्ति शहर का गला किसान नहीं घोंट रहे सरकार घोट रही है। दिल्ली बार्डर पर ऐसे हालात पैदा कर दिए जैसे दुश्मन देश की फौज खङी हो। ऐसा कर जनता में अकारण दहशत पैदा की। क्या किसी किसान ने किसी भी नागरिक का रास्ता रोकने की कोशिश की। अपने लंगर मे अपने उपर लाठी मारने वालों को भी खाना खिलाने वाले भला किसी को क्या नुकसान पहुँचाएंगे। जनता का गला तब घोंटा गया था जब सरकार कोरोना की दवा नहीं दे पा रही थी। जनता की साँसें तब रुकी थी जब आक्सीजन नहीं मिल रही थी। जनता बेबस तब थी जब उनके अपने सङकों पर इलाज के अभाव में दम तोङ रहे थे। जनता का गला तो सरकार थोडा थोडा रोज़ घोट रही है मगर आपको नज़र नही आता। आदरणीय आपके सामने एक बलात्कार पीडिता के शव को रातों रात जला दिया जाता है। आपके सामने फर्जी एनकाउंटर मे किसी को मारा छाता है और बेशर्मी से खुद को पाक साफ बताया जाता है। आपके सामने बेकसूरों पर राजद्रोह के मुकदमे दर्ज होते हैं। आपके सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालो के सिर फोङने के आदेश दिए जाते हैं। लेकिन आप भीष्मपितामह की तरह सरकार रूपी हस्तिनापुर से बंधे रहते हैं और किसान रूपी अभिमन्यु का वध करने के लिए चक्रव्यूह रचते हैं। जागिए न्यायमूर्ति, एक आपसे ही उम्मीद बाकि है वर्ना तो लोकतंत्र अब वेन्टिलेटर पर है। अगर आप भी ऐसी टिप्पणी करेंगे तो ये टूट जाएंगे और ध्यान रखिएगा किसान टूटा तो देश बिखर जाएगा।

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