सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का सुझाव मानने की हिम्मत जुटा पाएगी क्या मोदी सरकार?

अगर ऐसा सरकार अध्यादेश जारी होजाता है तो निश्चित महिलाओं पर उत्पीड़न और अपराध बहुत कम हो जायेंगे। एक स्वाक्ष नागरिकता संहिता के लिए यह लागू होना बहुत जरूरी है। लिंग भेद की समस्या खत्म हो जाएगी जो आज चरम स्थान मैंने कार्यालय,समाज,परिवार एवम सोच में ।

देश की उच्चतम न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने महिलाओं को बराबरी का हक़ दिलाने के लिए इतनी मुखरता से आवाज उठाई है और इसके लिए उन्होंने समाजवाद के प्रणेता कार्ल मार्क्स का उदाहरण देने में भी कोई हिचक नहीं दिखाई।प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमना ने न्यायपालिका में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण दिए जाने का सुझाव देकर केंद्र सरकार के सामने एक नई चुनौती पेश कर दी है, क्योंकि इसके लिए कानून तो आखिरकार सरकार को ही बनाना है।

दरअसल, ये एक ऐसी मांग है जिसे अगर सरकार मान लेती है, तो ये भानुमति का पिटारा खोलने जैसी ही होगी. क्योंकि इसके बाद संसद और राज्यों की विधानसभाओं में भी 50 फीसदी आरक्षण देने की मांग महिलाएं करेंगी। यही नहीं, फिर केंद्र से लेकर हर राज्य सरकार को अपने मंत्रिमंडल में भी 50 फीसदी हिस्सेदारी महिलाओं को देनी पड़ेगी, जो कोई भी सरकार नहीं देना चाहती।

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