पत्रकार और पत्रकारिता पर एक विचार

✒️अवधेश गुप्ता की कलम से

पत्रकारिता एक बेहतरीन और सम्मानित पेशा है, जिसके अंतर्गत एक पत्रकार जनता के दबे कुचले लोगों की आवाज को उठाता है समाज पर हो रहे अत्याचार बुराइयों सरकार की कमियों को उठाता रहा है आजादी के समय में भी देश को आजाद कराने में पत्रकारिता का अहम रोल रहा, संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने भी पत्रकारिता की। लोगों को पत्रकारों के द्वारा दी जाने वाली खबरों पर आंख मूंद कर विश्वास होता था देश आजाद हुआ और ऐसा दौर आया की पत्रकारिता ने सरकार की नाक में दम कर दिया प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मीडिया पर इमरजेंसी भी लगा दी थी परंतु उस समय की मजबूत मीडिया और पत्रकारिता ने सरकार को हिला कर रख दिया और अपना वजूद बनाए रखा धीरे-धीरे समय बदला और मीडिया संस्थानों ने अपना रवैया बदल लिया बजाय पब्लिक की आवाज बुलंद करने के सरकार की आवाज बुलंद करने लगे दौलत और शोहरत वालों के पीछे पीछे घूमने के लगे नेताओं के पीछे घूमने लगे अधिकारियों के पीछे घूमने लगे नतीजन मीडिया का अस्तित्व कमजोर होने लगा इस सब के लिए कोई एक आम पत्रकार नहीं बल्कि बड़े बड़े मीडिया संस्थान भी दोषी हैं रही बची कसर कुछ पत्रकारों ने पूरी कर दी अधिकारियों के पास बैठकर थानों में बैठकर चमचागिरी करके अपने ही पत्रकारिता को गर्त में पहुंचा दिया इसके बाद का काम किया सोशल मीडिया के पत्रकारों ने जिन्होंने बिना पत्रकारिता ज्ञान के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पत्रकारिता का धंधा शुरू कर दिया गांव गांव गली गली माइक लेकर घूमने लगे और पत्रकारिता शुरू करके थानों में पुलिस के पास या अधिकारियों के पास बैठकर दूसरे पत्रकारों की कमियां गिनाने लगे और अपने नंबर बढ़ाने के चक्कर में पत्रकारिता की जड़ को धीरे-धीरे समाप्त करने लगे। हमारे साथ ही ऐसा ही कुछ हुआ हमारे द्वारा पुलिस के विरुद्ध एक जन समस्या को लेकर ट्वीट किया जाता है परंतु मजे की बात है कि पुलिस को बुरा लगने की वजह एक सोशल मीडिया के पत्रकार को बुरा लगता है और कहता है कि “क्यों फर्जी टि्वट मार रहे हो, मैं समझता हूं कि इससे आगे और कुछ कहने की जरूरत नहीं।

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