राष्ट्रव्यापी बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान के तहत दो सदस्यीय टीम बकस्वाहा जंगल के निरीक्षण के लिए जंगल बचाओ अभियान ( विभिन्न संगठनों ले राष्ट्रीय समन्वय समिति ) झारखण्ड से कमलेश सिंह और बिहार से डॉ धर्मेंद्र कुमार आए है। दिनाँक 05/07/2021 को बकस्वाहा के स्थानीय राजेश यादव जी के सहयोग से हीरा खनन स्थान और शैलचित्र स्थान का भ्रमण किया गया साथ जी स्थानीय नागरिकों से वार्ता भी किया गया जहां पर बच्चों ने बताया कि उनकी जीविका, शिक्षण उसी जंगल पर निर्भर है। जंगल के सहयोग से महुआ, बीज, पत्तल, केंदू पत्ता इत्यादि का संग्रह कर सालों भर का खर्च निकल जाता है। साथ ही शैलचित्रों को देखने से लगता है कि उन्हें समय के साथ काफी नुकसान भी पहुंचाया जा रहा है, पत्थरों को तोड़ा जा रहा है, लेकिन तोड़ने के उपरांत भी स्पष्टता दिख रही है जिसे सरकार को संजोय रखने के लिए पुरातत्व विभाग को आगे लाना होगा। बक्सवाहा के रास्ते कठिनाई से भरा हुआ है, स्थानीय नागरिकों के रहन सहन कठिनाई से युक्त है। फिर भी सबो का कहना है कि जंगल का संरक्षण होना चाहिए। हज़ारो परिवार की जीविका जंगल के भरोसे है। ततपश्चात दिनाँक 06/07/2021 को छतरपुर के स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाओं से वार्ता की गई जिसमें सभी ने तीन दिवसीय कार्यक्रम में संशोधित करते हुए 07, 08 एवं 09 अगस्त पर्यावरण अगस्त क्रांति पर सुझाव आया । जिसपर जंगल बचाओ अभियान के सभी सदस्यों की सहमति बनी, इसमे मध्यप्रदेश सहित बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखण्ड, पंजाब, उड़ीसा, छतीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल इत्यादि प्रदेशो के पर्यावरण संरक्षको सहित 170 से अधिक संस्थाओं का बकस्वाहा जंगल बचाने के लिए जाना तय हुआ है। जिसमे प्रथम दिन दिनाँक 07अगस्त को स्थानीय एवं आगन्तुक पर्यावरण प्रेमियों के साथ सामूहिक बैठक कर सभी का मंतव्य और भविष्य के लिए देश के सभी जंगलो के संरक्षण सहित, पर्यावरण के अन्य गम्भीर विषयो की चर्चा की जाएगी, दिनाँक 08 अगस्त को बकस्वाहा जंगल जागरूकता अभियान चलाया जाएगा, तीसरे एवं अंतिम दिन दिनाँक 08/08/2021 को पोस्ट कार्ड अभियान, जागरूकता अभियान, ज्ञापन सहित मानव सृंखला बनाई जाएगी।
देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था के चारो स्तम्भों को प्रकृति के विनाश को रोकने के लिए पहल करना चाहिए, एक तरफ जहां पूरा विश्व कोरोना काल मे ऑक्सीजन के लिए त्राहिमाम कर रहा है, तो तुच्छ हीरे के लिए जंगलो को काटना अनुचित है, ऐसे गम्भीर और संकट काल में भी हम इंसानों को ऑक्सीजन की महत्ता समझ आ चुकी है। चूंकि प्रदेश के मुखिया स्वयं एक पर्यावरण प्रेमी है, प्रतिदिन एक पौधे लगाते हैं, फिर भी बकस्वाहा के जंगलो को कटने से रोकने की पहल नही करना हमलोगों के लिए उदासीनता का कारण भी है। अगर हमलोग गौर करें तो पूरी विश्व की आबादी में 0.01 % लोग ही हीरे का उपयोग करते हैं, जिसका कोई रीसेल वेल्यू भी नही होता, जबकि एक स्वस्थ पेड़ 230 लीटर ऑक्सीजन देकर 7 मानवों की जीवित रखता है और यहां ये विषय सवा दो लाख से भी ज्यादा स्वस्थ वृक्षो का है। जिससे करीब देश के 57 लाख लोगों को ऑक्सीजन मिलता है, इसके कटने से ऑक्सीजन की समस्या, जल समस्या के साथ साथ तापमान में भी काफी वृद्धि होगी, जल संकट बुंदेलखंड के लिए पहले से आम बात है और इसका ख़ासा असर भी पड़ेगा। जैसा कि खबरों से जानकारी मिला है कि केन बेतवा परियोजना में भी 23 लाख वृक्षो को काटा जाना है, जो और भी गम्भीर विषय है, पूरी पर्यावरण असन्तुलित होने का खतरा है। पूरा बुंदेलखंड जल विहीन बन जाएगा। इंसान, पशु, पक्षी, जीव, जंतु इत्यादि ऑक्सीजन और पानी के बिना पल भर भी जीवित नही रह सकते। सरकार, व्यवस्था और कम्पनी तीनो को संयुक्त रूप से जंगलो के संरक्षण पर पुनर्विचार करना चाहिए।उसी संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए टीम आज भोपाल पहुंची और विचार विमर्श किया गया । डा.राजीव जैन ने कहा की सरकार को जनभवनाओ को भी समझना चाहिए, ताकि मानव सृष्टि बची रह सकें और आने वाला हमारे वंशजो का जीवन सुचारू रूप से सुखमय हो सकें। इस कॉन्फ्रेंस में डॉ धर्मेंद्र कुमार, कमलेश सिंह, करुणा रघुवंशी, डॉ राजीव जैन, भूपेंद्र सिंह, सुनील दुबे, आनंद पटेल, परशुराम तिवारी,के. एस. तिवारी तुलसी कपिल इत्यादि सम्मिलित हुए।
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