आत्माराम त्रिपाठी की ✍🏻 से आज पूरे देश में वृक्ष बचाओ वृक्ष लगाओ अभियान चलाया जा रहा है सभी इसमें बढ़ चढ़ कर भागीदारी निभा रहे हैं। निभाना भी चाहिए वृक्षों से स्वच्छ साफ वातावरण मिलता है इसके लहलहाती पंखुड़ियों से मनुष्य के हृदय का ताप हर उसमें शांति का सकून का संचार कर देती है यह प्रकृति की अमूल्य धरोहर है जिसको जीवांत रखने का प्रयास ईमानदारी से होना चाहिए था। किंतु आज यह कैसी विडम्बना है जिसमें हम अपनी जिंदगी की सुरक्षा देखते हैं जिसमें हम अपना जीवन देखते हैं उसके साथ भी खिलवाड़ करने से बाज नहीं आते। व्रक्षारोपण कार्यक्रम वास्तव में आज सफेदपोश नेताओं एवं अधिकारियों की कमाई का जरिया मात्र बनकर के रहगया है ।आज हम वर्षों से देख रहे हैं की हर वर्ष यह अभियान चलाया जाता है जिसमें करोड़ों की तादाद में व्रक्षारोपण होते हैं इस व्रक्षारोपण के समय कहीं छुटभैय्ए नेताओं की सेल्फी पोज की फुटेज अखबारों के पन्नों की सोभा बढ़ाते हैं तो कहीं बड़े नेताओं की तो कहीं छोटे अधिकारी कर्मचारी से लेकर आला अधिकारियों की फोटो वीडियो सामने आ सोभा बढ़ाते हैं और अखबार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इन खबरों से अपने कालम की पूर्ति कर इन लोगों की पीठे थपथपाते हुए नहीं थकते। पर किसी पत्रकार के जेहन में यह बात क्यों नहीं आती कि एक लंबे समय से लगाए गए वह वृक्ष जो व्रक्षारोपण अभियान के तहत लगाएं गये आखिर वह कहां चले गए यही सवाल उन जनप्रतिनिधियों सहित आला अधिकारियों से भी है कि उनके द्वारा रोपित किए गए य करवाए गए व्रक्षारोपण अभियान के तहत के वह ब्रच्छ कहां गए जिन्हें इन्होंने रोपित किया था। जिनके साथ इन माननीयों सहित इन आला-अधिकारियों ने सेल्फी ली।आज अगर इनलोगो के द्वारा ही रोपित पौधे सलामत होते तो देश हराभरा हो जाता फिर जो अभियान चला के जनभागीदारी के तहत कार्य किए गए हो तो उस आधार पर आज चारों तरफ हरियाली हरे भरे लहलहाते वृक्ष ही दिखाई देने चाहिए थे लेकिन अफसोस वह मैदान में नहीं फाइलों में जरूर लहलहा रहे हैं फाइलों की सोभा जरूर बढ़ती चली जा रही है। साथ इस अभियान से जुड़े लोगों की तिजोरियों में पहुंच रहे कड़कड़ाते नोट व्रक्षारोपण अभियान के साक्षी बनते जा रहे हैं। इनके धन में इजाफा हो रहा है पर वृक्ष ज़हां जिस हाल में पहले थे वहीं आज है फिर चाहे वह सड़क में हो पार्क में हो य जंगल में जो पहले थे उन पर कुल्हाड़ी आरा कटर मशीनों का प्रयोग हो रहा है और अगर हर वर्ष नये रोपित होने वाले पौधों की बात करें तो उसे खुद रोपित करने वाले देखें कि वह कितने थे कितने बचे हैं । फाइलों में कितने अपने आप नष्ट हो गये कितने आग के हवाले हो गये सूख गये तुफान में उखड़ कर नष्ट हो गये यही सब बाजीगरी का खेल हो रहा है तभी तो हर वर्ष व्रक्षारोपण होते हैं पर समय आतें आते उनका पता नहीं चलता और वही वृक्ष वहीं जगह वहीं लोग वही समय फिर वही प्रतिक्रिया दुहराई जाने लगती है और यह क्रम अनवरत जारी रहेगा।

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