ये कोई अनहोनी बात नहीं है कि कोरोना महामारी ने न सिर्फ औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार पर ब्रेक लगाया है बल्कि इससे जुड़े अन्य क्षेत्रों को भी बुरी तरह से प्रभावित किया है । जब बाजारें बंद रहेगी , माल को लाने ले जाने वाले ट्रकों के चक्के जाम रहेंगे और खरीद-बिक्री पूरी तरह ठप्प रहेगी तो उत्पादन में गिरावट स्वाभाविक है । अनहोनी बात है ,अर्थव्यवस्था का अंग्रेजी वर्णमाला में आकार लेना । कॉमर्स का स्टूडेंट होने के बावजूद ,अभी पिछले मार्च महीने में ,कोरोना की पहली लहर खत्म होने के बाद जब अर्थव्यवस्था के वी शेप में रिकवरी का बयान आया तब पता लगा कि देश की अर्थव्यवस्था भी अंग्रेजी अक्षर के अनुसार आकार लेती है । बहरहाल ,पिछले वित्तवर्ष में कैपिटल गुड्स और टैक्सटाइल जैसे अनेक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उत्पादन में कमी दर्ज की गई तो इसका कारण भी लॉक डाउन के दौरान कोरोना कर्फ्यू ही था । कैपिटल गुड्स का मतलब मशीनरी ,उपकरण और उत्पादन में सहायता देने वाली वस्तुएं । कैपिटल गुड्स अर्थात पूंजीगत वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि तब होती है जब नए कारखाने लगाए जाते हैं और पहले से उत्पादन कर रहे कारखानों का विस्तार ,आधुनिकीकरण या विविधीकरण होता है । पिछले कई सालों (नोटबन्दी के बाद से ) अर्थव्यवस्था के निरंतर गिरते जाने से स्पष्ट है कि लोगों की आमदनी में कमी से क्रयशक्ति घटती जा रही है ,देश के उद्योग मांग के संकट से जूझ रहे हैं तो नए कारखाने लगाने का हौंसला भी टूट गया । ऐसे में कैपिटल गुड्स का उत्पादन और बिक्री घटना भी स्वाभाविक है । इसीलिए पिछले कुछ सालों में कैपिटल गुड्स के नाम पर दालमोठ ,भुजिया कुरकुरे और बिस्किट जैसे खाद्य पदार्थों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाली मशीनरी-उपकरण के अलावा कोई खास बिक्री नहीं हुई । इसे खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की तरक्की के रूप में बेशक,प्रचारित किया जा सकता है । टेक्सटाइल सेक्टर के उत्पादन में गिरावट का भी पहला कारण लॉक डाउन है तो दूसरा कारण वही है कि अगर कहीं कोरोना कर्फ्यू में ढील भी मिली तो गरीबों की छोड़िए ,अच्छे खासे खाते पीते मिडिल क्लास ने भी सिर्फ भोजन और दवा तक अपने खर्च को सीमित कर लिया ,इसलिए कि अधिकांश लोगों की आमदनी का स्रोत सूख गया था और भविष्य को लेकर भारी अनिश्चितता की स्थिति थी । इस प्रकार के माहौल में पूरे वित्तवर्ष 2020-21 के दौरान कॉमर्शियल वाहनों का उत्पादन 17 फीसदी ,एसी उत्पादन 22 फीसदी और फ्रिज के उत्पादन में 25 फीसदी की कमी दर्ज की गई तो जाहिर है कि इन वस्तुओं के संगठित क्षेत्र के निर्माताओं ने ठोस पूंजी आधार के कारण ,मजबूरी की हालत में यह झटका बर्दाश्त कर लिया लेकिन इन वस्तुओं के स्टॉकिस्टों ,डीलरों और विक्रेताओं के लिए यह झटका बहुत भारी पड़ा ,ये सब मिडिल क्लास से ताल्लुक रखते लोग हैं जिन्हें दुकान -शोरूम में फ्रिज,एसी, ओवन और वाशिंग मशीन जैसे आइटम्स की वैरायटी रखने के लिए बैंक लिमिट का सहारा मजबूरी में लेना पड़ता है । ऐसे मिडिल क्लास दुकानदारों की आमदनी ठप्प तो हुई ही , बिजली बिल और स्थायी कर्मचारियों के वेतन सहित बैंक ब्याज के बोझ ने दम निकाल दिया है जिसके चलते मिडिल क्लास के लिए ब्याज माफी और कर्ज के पुनर्गठन (री शिड्यूलिंग ) जैसी राहतों की उम्मीद की प्रतीक्षा की जा रही । अतः जब रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं के उत्पादन में जबरदस्त गिरावट हुई है तो ब्वायलर ,जेनरेटर, ट्रांसफॉर्मर, कंस्ट्रक्शन, माइनिंग,और अन्य क्षेत्रों से जुड़ी वस्तुओं के उत्पादन में भारी गिरावट भी जाहिर सी बात हहै । प्रतीक्षा सिर्फ इस बात की है कि अर्थव्यवस्था के इस पतन को अंग्रेजी वर्णमाला के किस अक्षर से जोड़ कर बताया जाएगा ? सुधार का आकार अगर वी , हो सकता है तो पतन का आकार भी एक्स,वाई,जेड ,कुछ तो होगा…!
विवेचक नरेश शर्मा
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