सरकारी प्रतिष्ठानों और बैंकों को निजीकरण के नाम पर बेचने के केंद्र सरकार के संकल्प के तहत चालू वित्तवर्ष के दौरान सेंट्रल बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक को बेचने का कार्यक्रम और तरीका तय कर लिया गया है । ये दोनों सरकारी बैंक वेतन का बोझ घटाने के लिए आकर्षक स्वैक्षिक सेवा निवृत्ति योजना (वीआरएस) पेश करेंगे ताकि खरीददार पर आर्थिक बोझ न पड़े । वीआरएस का भुगतान बैंक अपने फंड से करेगा और बाद में संभावित खरीददार के लिए आधे से भी कम वेतन पर सालाना कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर कर्मचारी रखने की स्थिति बन जाएगी । नीति आयोग के सूत्र इसे अतिरिक्त संसाधन अर्थात फालतू कर्मचारियों से मुक्ति बता रहे हैं तो सरकारी बैंकों में नौकरी का सपना संजोए नौजवानों को इससे बेहद निराशा होगी । दो सरकारी बैंकों को बेचने का फैसला आकस्मिक या हड़बड़ी में लिया हुआ नहीं है बल्कि चालू वित्तवर्ष के लिए पहली फरवरी को पेश बजट में वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने दो सरकारी बैंकों और एक साधारण बीमा (जनरल इंश्योरेंस कंपनी ) के निजीकरण की योजना घोषित की थी और यह निजीकरण अर्थात बिक्री चालू वित्तवर्ष अप्रैल-2021,मार्च-2022 के दौरान ही होना है । वैसे मेरी राय में सरकारी बैंकों के निजीकरण का कोई औचित्य नहीं है और अगर सरकार बैंकिंग सेक्टर में निजी खिलाड़ियों को उतारने की ज्यादा इक्छुक है तो उन्हें नए सिरे से लाइसेंस जारी कर के अपने बैंक खोलने की अनुमति दे सकती है लेकिन निजी क्षेत्र के लोग ज्यादा होशियार हैं । सरकारी बैंकों के साथ भारत सरकार का नाम जुड़ा है जिसे आज भी गांव गांव तक भारत सरकार की अलिखित गारंटी के रूप में जाना जाता है । इसलिए निजी क्षेत्र के लोग नया बैंक खोलने की बजाय दशकों से जमा जमाया बल्कि पूरी तरह से स्थापित बैंक खरीदना चाहते हैं क्योंकि मौजूदा दौर में यह ज्यादा आसान है । बहरहाल ,नीति आयोग ने हाल ही में सचिवों की एक समिति को सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक के नाम सुझाये हैं । चालू वित्तवर्ष के दौरान सरकार ने सरकारी कंपनियों और बैंकों की बिक्री से 1.75 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है जिसमें से उक्त दोनों बैंकों की बिक्री से सरकार को 44 हजार करोड़ मिलने की उम्मीद है । पिछले वर्ष भी सरकार ने इस अभियान से 2.10 लाख करोड़ रुपए जुटाए थे । सरकार एलआईसी के मेजर शेयर होल्डर आईडीबीआई बैंक से भी अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचना चाहती है तो स्पष्ट है कि इस बैंक के खरीददार को एलआईसी पर भी एक तरह से कंट्रोल मिल जाएगा । सरकार ने बेचने का फैसला कर लिया है तो बैंक और एलआईसी तक सारे सार्वजनिक प्रतिष्ठानों का बिकना तय है और उम्मीद भी नहीं है कि सरकार अपने निजीकरण अर्थात बिक्री अभियान पर पुनर्विचार भी करेगी लेकिन आम जनता के आर्थिक हितों के लिए कालांतर में ये खासा जोखिम पूर्ण फैसला होगा ।
विवेचक नरेश शर्मा
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