उत्तरप्रदेश के सात और मध्यप्रदेश के छह जिलों से मिल कर बना बुंदेलखंड देश का वह इलाका है जिसका जिक्र आते ही सूखा, गरीबी और भुखमरी की तस्वीर, आंखों के सामने कौंध जाती है।

खेत सूखने से पहले हलक सूखने का रिवाज़ यहां नियमितता के साथ सांठ गांठ कर चुका है।

यहां सूखे की मैय्यत के बाद तेरहवीं का भक्षक करने में सरकारों, नौकरशाहों, उद्द्यमियों की भूमिका तिलांजलि योग्य है, पिछले दो दशकों में प्राप्त आंकड़ों के हिसाब से तकरीबन 62 लाख से अधिक संख्या में लोग अपने माटी से पलायन करके दूसरे राज्यों में मेहनतकश, दिहाड़ी करने पर विवश हैं।

ऊपरी सतह पर सूखे की नुक्तापोशी का बखान इसलिए किया गया ताकि मध्यप्रदेश के छतरपुर जिला के अंतर्गत 382.131 हेक्टेयर जंगल में लहलहाते 2.15 लाख पेड़ों की कटाई से किसी का सीना पसीज जाए।

छोटे से फ्लैट में बोनसाई का एक पौधा लगाकर हरियाली को महसूस करने का भ्रम पालने वालों को ‘जंगल की ज़न्नत’ से कहीं अधिक ‘हीरे का जहन्नुम’ सुहाना प्रतीत दे रहा हैं। किसी का घर उजाड़ कर “सोने की बिलिया” में खीर खिलाने के प्रलोभन से भूख की तृप्ति तो संभव है लेकिन भावनाओं का संसार कभी वसर नही हो सकता।

जंगल हमारी दुनिया की लाइफ़लाइऩ हैं. उनके बग़ैर हम पृथ्वी पर ज़िंदगी का पहिया घूमने का तसव्वुर भी नहीं कर सकते हैं। विकास की अंधी दौड़ का अंजाम तो सिर्फ़ गहरी खाई के आगोश में समा जाना हैं।

भारत तिब्बत सीमा पर अपनी पैठ मजबूत करने के लिए भारत सरकार ने कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश के बीच सड़क निर्माण के लिए जंगलों की कटाई का आदेश दिया और आदेशानुसार सन 1973 में उत्तराखंड के रैणी गाँव में 2.5 हजार पेड़ काटना तय हुआ तो गाँव वालों ने विरोध किया, रैली निकाली मग़र सरकारों पर इसका कोई असर नही पड़ा, पेड़ काटने का आदेश भी दे दिया और ठेकेदारों कटाई करने पहुँच गए तभी गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाएं पेडों से चिपक गयी, उनका कहना था “पहले हमें काटों, फिर पेड़ को काटना” यह पल इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया, सरकार को पीछे हटना पड़ा। सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट जैसे पर्यावरणविद पेड़ो से चिपक कर उन्हें बचाने के आंदोलन का नेतृत्व करने लगे और बाकी सब इतिहास है जो पूरा विश्व इस चिपको आंदोलन की अनुमोदना करता है।

आज बक्सवाहा के जंगल को बचाने के लिये सबका एकमुश्त होकर संघर्ष करने की जरूरत है, मात्र 2.5 हजार पेड़ों के लिए अपना शीश तक कुर्बान करने के मद्दे ने सरकारें हिला दी और यहां 2.15 लाख पेड़ों के सरंक्षण के लिए हम एकमुश्त भी नही हो पा रहे हैं, जंगल के बदले सुंदरवन का दूरगामी दृश्य धुंधला ही रहेगा चमकेगा नही। जंगल को खत्म करके दूसरा सुंदरवन का सपना संजोया जा सकता है मगर जंगल खत्म होते ही हम मानवता खो देंगे, वन्यजीव विलुप्त हो जाएंगे, वनोन्मूलन से जैविकता का नाश होगा, प्रकृति कचौटेगी और उसका परिणाम मौजूदा दौर की भयवत्ता को दर्शायेगा कि कैसे प्रकृति से किये खिलबाड़ की मार आज सम्पूर्ण विश्व झेल रहा हैं।

ब्रिटेन के वेल्श स्थित बैंगोर यूनिवर्सिटी में पर्यावरण की प्रोफ़ेसर इज़ाबेल रोज़ा कहती हैं, “अगर हम सभी पेड़ों को काट डालते हैं, तो हम ऐसी धरती पर रह रहे होंगे, जो ज़िंदगी को सहारा नहीं दे सकेगी. दुनिया इतनी भयानक होगी कि वहां किसी जीव के पनपने का तो दूर, मौजूदा जीवों के जीने की कल्पना भी नहीं की जा सकती.”

वेदना और विनाशकारी हो उससे पहले एकजुट होकर हमें लड़ना होगा, जंगल को बचाना होगा, अपनी धरोहर की प्राण रक्षा करनी होगी तभी इस स्थिति से निपटा जा सकता हैं, आज तामशागोई बन कर हीरे के नाम की डींगे हाँकने वालों लेने के लिए सांसे नही मिलेगी और जलाने को लकड़ी तक नसीब नही होगी..

~ललितांक

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