देहरादून – सत्ता में TSR 2 का आना आरएसएस के मुख्य पदाधिकारी जो पराए से लगते थे वो आज मुखिया के सिपहेसलहार बन गए । आज सचिवालय से लेकर अफसरों की पोस्टिंग में दखल रखते है ।

अभी हाल में ही मीडिया सलाहकार मुख्यमंत्री के पद पर कुमाऊं के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश मानसेरा की नियुक्ति हुई है। यह नियुक्ति भी संघ के एक पूर्व क्षेत्र प्रचारक, जो अब संघ की केंद्रीय टीम का हिस्सा है, की पसंद बताई जा रही है। TSR 1 सरकार और संघ के बीच की समन्वय बैठक में संघ के लोगों को कोई पूंछता नही था , आज का समय जब संघ के बड़े ओहदेदार सप्ताह में दो बार मुख्यमंत्री तीरथ TSR 2 से मिलने न केवल निजी मुलाकात करते है रात्रि भोज और सायंकालीन चाय पर खूब बातों का इतिहास रचा जा रहा है ।

गौर करने की बात 2017 में त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने तो उनके थोड़े ही दिन बाद यह बात सामने आने लगी थी कि संघ के प्रान्त और क्षेत्र स्तर के पदाधिकारियों की बात अनसुनी की जाती है । कई बार त्रिवेंद्र के साथ नोक झोंक भी देखी गई।

तीरथ का मुख्यमंत्री बनना भी पैराशूट एंट्री आरएसएस की मानी जा रही है । नोक झोंक खत्म ही नहीं हुई बल्कि ख़टास का स्थान मधुर मिठास ने ले लिया है। क्या क्या ऐसा घटा की यह सोचने में मजबूर हुए की तीरथ TSR 2 का झुकाव आरएसएस की तरफ ज्यादा है। मिसाल देहरादून DM की अभी तक बहाली मालूम हुआ संघ के प्रान्त स्तर के मजबूत पदाधिकारी का आशीर्वाद प्राप्त है जिला मुखिया को।

उच्च स्तरीय पदाधिकारी महोदय ने अभी कई आईएएस आईपीएस को भी आश्वासन दिया है बेहतर पोस्टिंग के लिए। एक आईपीएस को इंटेलीजेंस का हेड बनवाने का भरोसा दिलाया है।

दूसरी आरबीएस रावत मुख्यमंत्री के सलाहकार जिनका इतिहास भी आरएसएस से जुड़ा है जिनकी सिफारिश एक NGO वाली महिला ने की जो वन विभाग में निष्क्रिय PCCF के पद में समय कटा । रिटायरमेंट के बाद सब ऑर्डिनेट सर्विस कमीशन के चेयरमैन बने लेकिन भर्ती में धांधली का मामला सामने आने से उपजे विवाद के बाद उन्होंने ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था।उस घपले में किसकी क्या भूमिका थी अभी स्पष्ट नहीं हो सका है। इसकी सुनवाई जारी है पर यह नही पता चला जांच में दोषी हैं की नही।

जब तीरथ रावत मुख्यमंत्री बने तो टॉप ब्यूरोक्रेट्स अपनी कुर्सी बचने के लिए दिल्ली में संघ कार्यालय के के चक्कर काटते देखे गए. ये वो ब्यूरोक्रेट्स हैं जो त्रिवेंद्र सरकार में भी खूब पावरफुल थे और उन्हें सरकार बदलने पर अपनी कुर्शी जाने का भय था. इनमें आईएएस आईपीएस और आईएफएस सभी शामिल थे लेकिन कुछ बड़े नामचीन अफसरो का दिल्ली जाना सबको हैरत में डाल गया था.

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