बदन पर सितारे लपेटे हुए, ओ पीके भैया कहां जा रहे हो ??
ये हैं प्रशांत किशोर, किसी पहचान के मोहताज नहीं और अभी अभी ममता दीदी को रिकॉर्ड जीत दिलवा दी है और भाजपा को अपने मंसूबों में रोक दिया है.
भाड़े पर चुनावी सर्कस चलाने वाले प्रसांत किशोर ने आइपैक का काम छोड़ने का निर्णय लिया है. मैं सोचता हूँ, कि सात साल से चुनावी जीतों के तमाम मेडल बदन पर सजाए, किशोर की जवानी किधर को जा रही है ??
ये तो पक्का है कि पीके की उम्र रिटायरमेंट की नही है. फिर पॉलिटिक्स का कीड़ा एक बार खून में घुस जाये, तो जीतेजी नही निकलता. ऐसे में जब वे कहते है कि “आई क्विट व्हाट आई एम डूइंग” तो समझना चाहिए कि “ही क्विट्स द वे ही इज डूइंग” .
सात सालों में नेशनल और रीजनल इलेक्शन में पीके ने अलग अलग डायरेक्शन से भागीदारी की है. देश के हर हिस्से में की है…सत्ता के साथ की है, सत्ता के खिलाफ की है.
उनके पास सब है. डेटाबेस है, मास साइकोलॉजी की समझ है,सैफ़ॉलोजी की समझ है, कॉन्फिडेंस है, चुनावी जीत का अनुभव हैं, नाम है , पैसा है, शोहरत है…
‘इज्जत’ नही है. — अब पीके को चाहिए फुल इज्जत. किराएदारी नही बल्कि अपना मकान. तो कोई बुद्धिमानी नही ये गेसिंग करने में की वे राजनीति में सीधे घुसेंगे. बुद्धिमानी तो यह पहचानने में है, कि कैसे घुसेंगे ???
रीजनल पार्टी बनाना या किसी रीजनल पार्टी को जॉइन करना उनके अहम को सूट नही करेगा. किसी भाजपा या कांग्रेस में जाकर कारिंदा बनना भी मंजूर नही करेगा. तीसरा विकल्प, खुद की नेशनल पार्टी खड़ा करना ..
वो भी बीजेपी के राज में. हाहाहा, वो पीके है, ही मस्ट नो द ऑड्स. तब क्या ?? पता नही. लेकिन जो होगा, कोई इन्नोवेशन होगा — पर मेरा वाइल्ड गेस है कि कोई नेटवर्क जैसा खड़ा करेंगे, जिसमे उनके कई पूर्व क्लाइंट जुड़े हों. एक स्केलेटन जो वो खुद हों, और दिल जिगर फेफड़ा रीजनल दल,
नेटवर्क कांग्रेस के साथ या बगैर ?? डिपेंड करेगा.
क्योंकि इसी पर तो सौदा है. कांग्रेस के बगैर ये धड़, सर विहीन होगा. लेकिन सर कांग्रेस हो गया, तो पीके के हाथ क्या होगा ?? वे घुमा फिराकर फिर से पोलिटीकल स्ट्रैटजिस्ट मात्र तो नही रह जाएंगे.
तो सौदा यहीं है.
एक चुनाव की तैयारी में वो दो साल लेते हैं. अभी पीके के पास तीन है. एक साल नेटवर्क का बनना, सौदेबाजी तय करना, अपना इच्छीत स्थान पक्का करना. और फिर दो साल कैंपेन..
भाई नवनीत चतुर्वेदी की भाषा में, पीके “उसी गुरुकुल” के हैं. आजकल गुरुकुल के इरादे भी बदल रहे हैं, चैनलों अखबारों की भाषा भी. हवा का रुख बदल रहा है और पीके, वो नहा धोकर घर से बाहर आते हैं, हवा का रूख देखते हैं, और फिर उस हिसाब से तय करते हैं, की आज कहाँ जाएंगे.
तो मोदी का कोई भविष्य नही है, और संघ मूर्खों का जमघट हो चला. तो 2024 में शाह (+EVM) वर्सेज पीके देखने को मिलेगा क्या ??
स्टे ट्यूण्ड.. आंखे पीके पर रखें और पूछें : बदन पर सितारे लपेटे हुए, ओ पीके भैया कहां जा रहे हो ??
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