राष्ट्र परिभाषित होता है उसके नागरिकों के आचरण से , इसमें सम्मलित है आम नागरिक जो बनाते हैं सरकार ! व्यवस्था चलाने के लिए अधिकारी गण जिनके माध्यम से सरकार व्यवस्था को चलाती है । दुख इस बात का नही की सरकार इस आपदा में उस तरह का प्रदर्शन नही कर पायी जैसी उस से उम्मीदें थी अपितु एक राष्ट्र के तौर पर शायद हम फैल हो गए । सरकार से मेरा अभिपर्याय किसी विशेष राजनैतिक दल से नही है , सत्ता सम्भालने वाले दल से है , चाहे वो राष्ट्रीय सरकारें हो या राज्य सरकारें हों । मेरे अनुसार सरकार ने पहली लहर को जितनी कुशलता से नियंत्रित किया था उतनी ही वो दूसरी लहर को सम्भालने में असफल रही , बहुत जल्दी सरकार ने मान लिया की सब ठीक है ओर देश में फिर से वो ही मस्ती की लहर लौट आयी , मै आप हम सभी तो मस्ती में थे हमारी लापरवाही हमें अंधरे की तरफ़ ले जा रही थी हमें ये पता ही नही था इसका ही फल हम आज भोगने को मजबूर हैं । अब हम सभी एक दूसरे को दोष दे रहे हैं । इस बार राष्ट्र के तौर पर फैल होना इसलिए लगता है 1.सरकार इसलिए क्यूँकि कोई भी अपनी ज़िम्मेदारी नही मान रहा केंद्र के हिसाब से राज्य सरकार ओर राज्य के हिसाब से केंद्र सरकार इस सब की ज़िम्मेदार है , एक दूसरे को ग़लत साबित करने से हम ठीक नही हो जाते । 2.अधिकारी गण इस स्थिति का सही से मैनेजमेंट नही कर पाए । 3.ओर सबसे ज़्यादा निराश किया हम लोगों ने , हम में से कुछ ने तो इस आपदा को अवसर के तौर पर देखा नक़ली दवाएँ बनायी ब्लैक में दवाइयाँ बेची , हम ने आपदा को देश के लिए नही देखा बस अपने हिसाब से ही देखा । हम सभी को मिल कर ही प्रयास करना होगा मै ,आप , अधिकारी , सरकार ये एक राष्ट्र की तरह जब तक एक साथ मिल कर काम नही करेंगे तब तक हम इससे बाहर नही निकल पाएँगे । जैसे कार के चारों पंहिया जब तक एक दिशा में नही बढ़ते तब तक वो मंज़िल नही पहुँचती , हम साथ चलेंगे तो राष्ट्र जीतेगा। जय हिंद राष्ट्र सर्वोपरी लेखक सूत्र अनुरोध पंवार -नेशनल शूटर / समाजसेवी

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