रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का यह बयान सरकार के अड़ियल पन के अब तक के रुख में बदलाव का संकेत है कि सरकार कृषि व्यवस्था में जरूरी हर बदलाव के लिए तैयार है ,किसान जितनी बार , जहां बैठने को कहेंगे , बातचीत की जाएगी । राजनाथ सिंह ने यह भी भरोसा दिलाया कि कानून के हर पहलू पर चर्चा की जाएगी और एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य ) बंद नहीं होगी । वैसे यह बात राजनाथ सिंह को तीन महीने से भी ज्यादा समय से धरना दे रहे किसानों के बीच गाजीपुर या सिंघु बॉर्डर पर जा कर करनी चाहिए थी । भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी के उद्धाटन अवसर पर दिए गए इस बयान का वजन अपने आप कम हो गया । इसलिए कि अभी तक इस मामले के साथ प्रधानमंत्री मोदीजी खुद अपने आप को जोड़े थे । जब मोदीजी ने सरकार और किसानों के बीच कृषि कानूनों के समाधान के लिए सिर्फ एक फोन कॉल की दूरी , सार्वजनिक रूप से घोषित की थी तो उम्मीद जागी थी कि तीनों कृषि कानूनों में किसानों की मांग के अनुरूप संशोधन के बाद अब गतिरोध खत्म हो जाएगा । लेकिन आंदोलनकारी किसानों से वार्ता का कोई प्रयास नहीं हुआ न कोई ऐसा फोन नंबर सार्वजनिक किया गया जिस पर संपर्क करके किसान नेता कृषि कानूनों के बारे में अपनी चिंताएं प्रधानमंत्री जी से साझा कर सकते । उल्टे सरकार , पार्टी और संघ परिवार की ओर से किसानों को बदनाम करने का प्रयास शुरू हुआ जिसके तहत उन पर आतंकवादियों से समर्थन लेने सहित आंदोलन की फंडिंग पर सवाल उठाए गए । इससे किसानों में आक्रोश स्वाभाविक ही था । अतः जब किसानों ने चनाव वाले राज्यों में भाजपा विरोधी प्रचार की शुरुआत बंगाल से शुरू की तो सरकार को भी दबाव में आना पड़ा । रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का बयान इसी दबाव को दर्शाता है ।
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