उत्तरखण्ड में ऐसे कड़ाके की ठंड में ग्लेशियर फूटने की बात मेरे गले के नीचे नही उतरती बल्कि कतिपय मॉनव जनित कारकों पर बरबस ध्यान आकृष्ट करती है।

अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA ने भारत की RAW के साथ मिलकर चीन को उसकी मनमानी करने से रोकने के लिए मोरार जी देसाई की अनुमति से 1965 में उत्तरखण्ड के नन्दा देवी पर्वत पर एक न्यूक्लियर डिवाइस जिसे न्यूक्लियर पावर टेलीमेट्री लिसनिंग डिवाइस यानी NPTLD कहा जाता है को लगाने की योजना बनाई थी।

दरअसल समुद्र तल से 7800 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर नंदा देवी पर्वत स्थित है। यह भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है। तब शीतयुद्ध का दौर था और उस वक्त दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुई थी। भारत और अमेरिका ने 1965 में मिशन नंदा देवी के रूप में एक खुफिया अभियान चलाया था। चीन की परमाणु गतिविधियों पर नकेल कसने के लिए ये सीक्रेट मिशन शुरू हुआ था। चीन की परमाणु गतिविधियों पर निगरानी के लिए अमेरिका ने भारत से मदद मांगी। कंचनजंगा पर खुफिया डिवाइस लगाने का प्लान बनाया गया लेकिन भारतीय सेना ने जब इसको टेढ़ी खीर बताया तो 25 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित नंदा देवी पर रेडियोऐक्टिव डिवाइस लगाने का फैसला हुआ।

1964 में चीन ने शिनजियान प्रांत में न्यूक्लियर टेस्ट किया। इसके बाद 1965 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने हिमालय की चोटियों से चीन की परमाणु गतिविधियों पर निगहबानी का प्लान बनाया। इसके लिए भारतीय खुफिया विभाग (IB) से मदद लेकर नंदा देवी पर्वत पर खुफिया यंत्र लगाने की कोशिश की गई। पहाड़ पर 56 किलोग्राम के यंत्र स्थापित किए जाने थे। इन डिवाइस में 8 से 10 फीट ऊंचा एंटीना, दो ट्रांस रिसीवर सेट और परमाणु सहायक शक्ति जनरेटर (SNAP सिस्टम) शामिल थे। जनरेटर के न्यूक्लियर फ्यूल में प्लूटोनियम के साथ कैप्सूल भी थे, जिनको एक स्पेशल कंटेनर में रखा गया था। न्यूक्लियर फ्यूल जनरेटर हिरोशिमा पर गिराए गए बम के आधे वजन का था। टीम के शेरपाओं ने इसे गुरुरिंगपोचे नाम दिया था। 200 लोगों की टीम इस सीक्रेट मिशन से जुड़ी हुई थी।

अक्टूबर 1965 में ज़ब यह डिवाइस वहां लगाई जा रही थी बल्कि टीम नंदा देवी पर्वत के करीब 24 हजार फीट ऊंचाई पर स्थित कैंप-4 पहुंच गई थी तभी अचानक मौसम खराब हो गया और हिम स्खलन होने लगा परिणामतः टीम लीडर मनमोहन सिंह कोहली के लिए यह करो या मरो का सवाल था सो उन्हें अपनी टीम या खुफिया डिवाइस में से किसी एक को चुनना था जिसमे से उन्होंने टीम को चुना और वह डिवाइस यानी परमाणु सहायक शक्ति जनरेटर मशीन और प्लूटोनियम कैप्सूल को कैंप-4 पर ही छोड़कर आनन फानन में सबको वापस लौटना पड़ा। आज भी वह NPTLD डिवाइस वही मौजूद है। इस डिवाइस में प्लूटोनियम था। यानी सबसे तेज रेडिएशन वाला तत्व।

सिर्फ एक बार पावर दे देने के बाद इस डिवाइस की लाइफ 100 साल बनी रहती है। इस डिवाइस को वहां जाकर खोजने की कई बार कोशिश हुई किन्तु नही मिली। अगर यह डिवाइस अपने कवर से बाहर आ जाती है तो इसके रेडिएशन से भारी तबाही हो सकती है। इसका रेडिएशन बड़ा खतरनाक होता है। परमाणु बम के नाम और रेडिएशन से सभी परिचित ही है।

सुप्रीम कोर्ट ने ग्लेशियर फटने जैसी आपदाओं को रोकने के लिए 2013 में रवि चोपड़ा कमेटी बनाई। इस कमेटी ने कई सुझाव दिए थे और मना किया था कि इस संवेदनशील ज़ोन में डेवलोपमेंट ना करवाये, वन्य जीव अभ्यारण्य ना बनवाये। यह क्षेत्र भूकम्पीय ज़ोन में भी आता है। कमेटी ने कहा था कि क्रशर मशीन लगाकर पत्थर तोड़े ताकि ग्लेशियर्स में वाइब्रेशन ना हो जबकि ठेकेदार समय और धन बचाने के लिए विस्फोटक लगाकर उड़ा देते हैं।

अतैव कुछ सामान्य से प्रश्न उतपन्न हो सकते है जैसे कि वहां ऋषिगंगा प्रोजेक्ट क्यों चल रहा था? रवि चोपड़ा कमेटी की बात क्यों नही मानी गयी? सेस्मिक जोन 4 और 5 यानी वेरी हाई रिस्क सेक्टर पर बांध क्यों बनाया गया? क्या गुम हुआ भारी भरकम NPTLD डिवाइस का रेडिएशन इसके लिए जिम्मेवार है? आदि आदि। इन प्रश्नों के उत्तर जांच के बाद मिल सकेंगे।

लेखक-निखिलेश मिश्रा

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