कालाबजारी यानी जमाखोरी केवल तभी होती है जब सम्बन्धित वस्तु की कमी होती है किंतु जब यही स्थिति उलटकर अधिशेष में बदल जाती है अर्थात निर्यात योग्य बन जाती है तब चाहकर भी कालाबजारी/जमाखोरी नही होती और मूल्य भी सस्ता हो जाता है।

आइये आवश्यक वस्तु अधिनियम के बारे में ठीक से समझ लेते हैं कि आखिर अब जमाखोरी क्यों सम्भव नही होगी?

यह कानून बनने के बाद खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के प्रति बड़ी कंपनियां और विदेशी निवेशक आकर्षित हों सकेगे। इसके जरिये कोल्ड स्टोर व भंडारण गृहों की व्यवस्था अधिक दुरुस्त हो सकेगी। जब खाद्य आपूर्ति श्रृंखला दुरुस्त होगी तो कीमतों में भी स्थिरता आएगी। फसल अच्छी होने की स्थिति में कीमत बहुत कम नहीं होगी और खराब होने की स्थिति में मूल्य आसमान पर भी नहीं चढ़ेगा। भंडारण की सुविधा अच्छी होने के बाद अनाज की बर्बादी भी कम हो जाएगी।

यह कानून साल १९५५ में ऐसे समय में बना था जब भारत खाद्य पदार्थों की भयंकर कमी से जूझ रहा था। इसलिए इस कानून का उद्देश्य इन वस्तुओं की जमाखोरी और कालाबाजारी को रोकना था ताकि उचित मूल्य पर सभी को खाने का सामान मुहैया कराया जा सके। चूंकि अब भारत इन वस्तुओं का पर्याप्त उत्पादन करता है, ऐसे में इन पर नियंत्रण की जरूरत नहीं है।

अब उत्‍पादन, भंडारण, ढुलाई, वितरण और आपूर्ति करने की आजादी से व्‍यापक स्‍तर पर उत्‍पादन करना संभव हो जाएगा, साथ ही कृषि क्षेत्र में निजी/प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया जा सकेगा। इससे कोल्‍ड स्‍टोरेज में निवेश बढ़ाने और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला (सप्‍लाई चेन) के आधुनिकीकरण में मदद मिलेगी।

आवश्यक वस्तु अधिनियम १९५५ के तहत, केंद्र राज्य सरकारों के माध्यम से कुल आठ श्रेणियों के वस्तुओं पर नियंत्रण रखती है-

इसमें (१) ड्रग्स, (२) उर्वरक, (३) खाद्य तिलहन एवं तेल समेत खाने की चीजें, (४) कपास से बना धागा, (५) पेट्रोलियम तथा पेट्रोलियम उत्पाद, (६) कच्चा जूट और जूट वस्त्र, (७) खाद्य-फसलों के बीज और फल तथा सब्जियां, पशुओं के चारे के बीज, कपास के बीज तथा जूट के बीज और (८) फेस मास्क तथा हैंड सैनिटाइजर शामिल हैं।

केंद्र इस कानून में दी गईं शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राज्य सरकारों को ‘नियंत्रण आदेश’ जारी करने के लिए कहता है, जिसके तहत वस्तुओं को स्टॉक यानी जमा करने की एक सीमा तय की जाती है और सामान के आवागमन पर नजर रखी जाती है।

इसके जरिये लाइसेंस लेना अनिवार्य बनाया जा सकता है और वस्तुओं के उत्पादन पर लेवी (एक प्रकार का कर) भी लगाया जा सकता है। जब कभी राज्यों ने इन शक्तियों का इस्तेमाल किया है, ऐसे हजारों पुलिस केस दर्ज किए गए, जिसमें ‘नियंत्रण आदेश’ के उल्लंघन के आरोप थे।

अब सरकार ने इसमें संशोधन करके अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेलों, प्‍याज और आलू को धारा ३(१) के दायरे से बाहर कर दिया गया है, जिसके तहत केंद्र को आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति, वितरण पर नियंत्रण करने का अधिकार मिला हुआ है।

अब सिर्फ अकाल, युद्ध, कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि और प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में ही सरकार द्वारा इन वस्तुओं पर नियंत्रण किया जा सकेगा। इस कानून के तहत केंद्र को यह भी अधिकार है कि वो आवश्यकता के अनुसार से आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में जोड़ या घटा कर सकती है।

यह पहली बार नहीं है जब केंद्र ने इस एक्ट के जरिये नियंत्रण के दायरे के कुछ वस्तुओं को बाहर किया है, बल्कि उदाहरण के लिए वर्ष २००२ में वाजपेयी सरकार ने गेहूं, धान, चावल, मोटे अनाज और खाद्य तेलों पर लाइसेंस और स्टॉक सीमा को समाप्त कर दिया था।

सरकार द्वारा स्टॉक लिमिट या वस्तुओं को जमा करने की सीमा तय करने का फैसला कृषि उत्पाद के मूल्य वृद्धि पर निर्भर करेगी। शीघ्र नष्‍ट होने वाली कृषि उपज के मामले में १२ महीने पहले या पिछले पांच वर्षों के औसत खुदरा मूल्य की तुलना में यदि उत्पाद के वर्तमान मूल्य में १०० फीसदी वृद्धि होती है, तो इसके स्टॉक की सीमा तय की जाएगी।

इसी तरह शीघ्र नष्ट न होने वाले कृषि खाद्य पदार्थों के मामले में पिछले १२ महीने पहले या पिछले पांच वर्षों के औसत खुदरा मूल्य की तुलना में यदि उत्पाद के वर्तमान मूल्य में ५० फीसदी वृद्धि होती है, तो इसके स्टॉक की सीमा तय की जाएगी।

हालांकि मूल्‍य श्रृंखला (वैल्‍यू चेन) के किसी भी प्रतिभागी की स्‍थापित क्षमता और किसी भी निर्यातक की निर्यात मांग इस तरह की स्‍टॉक सीमा लगाए जाने से मुक्‍त रहेगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कृषि क्षेत्र में निवेश हतोत्‍साहित न हो।

यहां ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात ये है कि सरकार को इस तरह के फैसले लेने के लिए ‘एगमार्कनेट मूल्यों’ पर निर्भर रहना पड़ेगा। एगमार्कनेट केंद्रीय कृषि मंत्रालय का एक पोर्टल है जो कि मंडियों में कृषि उत्पादों के आवक तथा मूल्यों की जानकारी देता है।

वैसे तो भारत में ज्‍यादातर कृषि जिंसों या वस्‍तुओं के उत्‍पादन में अधिशेष (सरप्‍लस) की स्थिति है, लेकिन इसके बावजूद कोल्‍ड स्‍टोरेज, प्रसंस्‍करण और निर्यात में निवेश के अभाव में किसान अपनी उपज के उचित मूल्‍य पाने में असमर्थ रहे हैं क्‍योंकि आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम की लटकती तलवार के कारण उनका व्यापार हतोत्‍साहित होता है।

ऐसे में जब भी शीघ्र नष्‍ट हो जाने वाली कृषि उपज की बंपर पैदावार होती है, तो किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। यदि पर्याप्‍त प्रसंस्‍करण सुविधाएं उपलब्‍ध हों, तो बड़े पैमाने पर इस तरह की बर्बादी को रोका जा सकता है।

इस साल के आर्थिक सर्वेक्षण में भारत के कृषि अर्थव्यवस्था में विकृति के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसमें विशेष रूप से ये भी बताया गया है कि आवश्यक वस्तु अधिनियन के तहत कृषि उत्पादों के स्टॉक की सीमा (स्टॉक लिमिट) तय करने से न तो मूल्यों में गिरावट आई है और न ही कीमतो में अस्थिरता में कमी आई है। जाहिर है कि सरकार ने सर्वेक्षण की इन बातों को ध्यान में रखा और ये संशोधन विधेयक लेकर आई है।

————–सुझाव———

(१) स्टॉक लिमिट को लेकर निर्यात आदेश क्या होगा, इस बाबत विस्तृत स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए क्योंकि साल २०००-२००४ के दौरान कई बेईमान गेहूं निर्यातकों ने ओपन मार्केट सेल स्कीम (निर्यात) के तहत गेहूं का निर्यात जारी रखने के लिए इसी तरह की खामियों का इस्तेमाल किया था, जिसके कारण आखिरकार ०१ अप्रैल, २००६ को बफर स्टॉक अपनी सीमा के मुकाबले घटकर आधा हो गया था। सरकार को २००६-०८ में लगभग ५.५ मिलियन टन गेहूं का आयात करना पड़ा था।

हमारे खाद्य स्टॉक के प्रबंधन में एक बड़ी कमी यह है कि सरकार को निजी क्षेत्र के पास उपलब्ध स्टॉक की जानकारी नहीं होती है। गेहूं और चावल के केंद्रीय पूल के स्टॉक के मामले में, न केवल लोगों को स्टॉक की मात्रा के बारे में पता है बल्कि सरकार को एफसीआई के कम्प्यूटरीकृत स्टॉक प्रबंधन प्रणाली के माध्यम किस जगह पर कितना स्टॉक पड़ा है, वो भी पता होता है। प्राइवेट सेक्टर में रखे के स्टॉक के बारे में ऐसी कोई जानकारी नहीं है।

चूंकि सरकार अब एपीएमसी के बाहर कृषि उपज के खरीददारी की व्यवस्था तैयार करने जा रही है, ऐसे में सरकार के पास ये जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए कि प्राइवेट ट्रेडर्स एवं कंपनियों के पास कितना स्टॉक पड़ा है, तभी स्टॉक लिमिट लगाने या ना लगाने को लेकर सही समय पर फैसला लिया जा सकेगा।

(२) सरकार को ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उपर्युक्त विधेयक एपीएमसी व्यवस्था को बर्बाद न करे।

(प्रस्तुत पोस्ट हेतु बाह्य श्रोतो का यथास्थान उपयोग किया गया है।)

विश्लेषक -निखिलेश मिश्रा संपादकीय रुद्र भारतसत्य

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