आत्माराम त्रिपाठी की✍🏻से लोकतंत्र में संवाद सबसे महत्वपूर्ण पक्ष होता है। यह बात सही है कि विपक्ष से लेकर हर किसी की बात सुनने की जिम्मेदारी सरकार की होती है। मुश्किल यह है कि किसान नेताओं और सरकार के बीच बातचीत जिस तरह का रुख कर गई है उसमें ठहराव आ गया है आंदोलन के खत्म होने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। किसान नेता साहब कर चुके हैं कि सरकार तीनों कानूनों को वापस लें तभी आंदोलन खत्म होगा उधर केंद्र सरकार पहले ही साफ कर चुकी है कि वह कानूनों को वापस नहीं लेगी। हां इनमें 8 संशोधन जरूर किए जा सकते हैं सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भी लिखित गारंटी देने की बात कह रही है लेकिन किसान नेता राजी नहीं। दोनों पक्षों में सुलह नहीं हो पा रही है जिसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है दिल्ली से जुड़े दूसरे राज्यों के रास्तों पर किसानों का कर्जा है उत्तर प्रदेश हरियाणा पंजाब और राजस्थान के प्रमुख रास्तों पर किसानों का कब्जा है ऐसे में यहां से गुजरने वाले आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। हर आंदोलन में आम जनता की मुश्किल बढ़ जाती है वह अपने आप को फंसा हुआ महसूस करती है कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद सुलह का रास्ता निकालना ही चाहिए किसी भी विवाद का हल बातचीत से ही होता है बातचीत के क्रम को वापस शुरू किया जाए और मध्य का रास्ता निकालकर इस मुद्दे का उचित समाधान तलाशा जाए दूसरे राजनीतिक दलों के भी ऐसे गंभीर मसलों पर सकारात्मक रवैया अपनाकर समाधान का रास्ता निकालने में सहयोग करना चाहिए। एक तरह से देखा जाए तो यह कांट्रैक्ट किसान के लिए एमएसपी एक्ट के कारण यह समझौते गैर कानूनी होते थे। अब कृषि क्षेत्र में बड़ी मात्रा में निजी निवेश के लिए रास्ता खुल गया है छोटे किसानों के लिए नई उम्मीद पैदा हो गई है और वह अपनी जमीन के छोटे टुकड़े से भी परिवार का भरण पोषण कर सकते हैं। कांट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर बनाए गए कानून का नाम ही है किसान सरंक्षण और सशक्तिकरण कानून आने वाले समय में यह अपने नाम के अनुसार ही यह काम कर सकता है। इस कानून के विरोध में यह प्रचार किया जा रहा है कि इससे कंपनियां किसानों की जमीन कब्जा कर लेगी जबकि हकीकत यह है कि इस कानून में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि किसान और कंपनी के बीच केवल कृषि उत्पाद को लेकर ही अनमोल किया जा सकता है जमीन को शामिल नहीं किया जा सकता सरकार ने किसानों को कंपनियों की चालबाजी से बचाने के लिए किसानों और कंपनियों के बीच होने वाले समझौतों के लिए कुछ मॉडल कांट्रैक्ट फार्म तैयार करने को कहा है जिनका इस्तेमाल इन कंस्ट्रक्ट्स के लिए किया जाएगा। इन फार्म्स में केवल खाली जगहों को भर कर यह कंस्ट्रक्ट किए जा सकेंगे। इन फॉर्म्स में कुछ भी नया नहीं जोड़ा जा सकेगा और ना ही हटाया जा सकेगा यह कॉन्टैक्ट्स फसल और कृषि से संबंधित सेवाओं के लिए ही किए जा सकते हैं फसल की कीमत तय करने के दो आधार होंगे एक तरीका हो सकता है कि दोनों एक कीमत तय कर लेंगे और फसल होने पर वही कीमत कंपनी देगी दूसरे में एक कीमत तय कर ली जाएगी लेकिन बाजार में कीमत बढ़ने पर किसान को तय कीमत पर बोनस भी देना होगा। कान्ट्रैक्ट फार्मिंग कानून को लेकर यह भी झूठ फैलाया जा रहा है कि कंपनियां किसानों से 20 20 साल का कॉन्ट्रैक्ट करके उसकी जमीन पर कब्जा कर लेगी लेकिन सच्चाई यह है कि इस कानून में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि कान्ट्रैक्ट्स की अधिकतम सीमा 5 साल की होगी। हनुमान जी की आवाज में कंपनी जो भी अस्थाई और स्थाई ढांचा क्षेत्र में बनाएगी वह उसे अगली फसल की बुवाई से पहले किसी भी हालत में अपने खर्चे से हटाना होगा और अगर वह नहीं हटाती है तो उस पर किसान का कब्जा हो जाएगा छोटे किसानों के लिए बड़ी कंपनियों से अनुबंध करना मुश्किल होगा इसलिए सरकार ने यह तय किया है कि छोटे किसान एक संघ बनाकर यह समझौते कर सकते हैं और कंपनियों के लिए भी यह सही होगा कि वह अलग-अलग समझौते करने की जगह सबके साथ एक समझौता कर सके। सरकार चाहती है कि सरकार चाहती है कि कांट्रैक्ट फार्मिंग से फसल विविधता बड़े ताकि किसानों की आय में बढ़ोतरी हो। यह सच है की छोटे किसान गेहूं चावल पैदा करके अपनी आए नहीं बढ़ा सकती इसलिए सरकार चाहती है कि किसान दूसरे उत्पादों की तरफ ध्यान दें किसानों के लिए मुश्किल यह है कि उन्हें अपने उत्पादों के लिए बाजार नहीं मिलता जिसके कारण वह अपने उत्पाद की सही कीमत नहीं ले पाते। अगर खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां ग्रामों में अपने उद्योग लगाती है तो छोटे किसानों को दोहरा लाभ होगा एक पुणे तरह-तरह के अपने उत्पादों की सही कीमत मिल सकेगी और इसके अलावा उन्हें खेती के अतिरिक्त कंपनी में भी रोजगार मिल सकता है जिसके कारण गांव से होने वाला पलायन भी रुक जाएगा किसानों और कंपनी के बीच विवाद होने पर कानून में यह व्यवस्था की गई है कि अपने विवाद के निपटारे के लिए वह एसडीएम के पास जा सकते हैं जो अपने एक सहायक अधिकारी को उनके बीच समझौते के लिए नियुक्त करेगा। इस कानून में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि विवाद के निपटारे पर अधिकारी जुर्माना भी लगा सकता है लेकिन किसान को सिर्फ विवादित राशि देनी होगी जबकि कंपनी पर विवादित राष्ट्र का डेढ़ गुना जुर्माना लगाया जा सकता है। जिसका भुगतान कंपनी किसान को करेगी देखा जाए तो इसमें किसानों को नुकसान ना होने पाए इसका ध्यान रखा गया है इस पर किसानों को एतराज है कि उन्हें अदालत जाने का हक मिलना चाहिए सरकार का कहना है कि अदालत में ज्यादा वक्त लगने पर किसान का नुकसान हो सकता है और इस व्यवस्था में उसे ज्यादा से ज्यादा 3 महीने का समय लगेगा किसानों को अदालतों में होने वाले खर्चों से भी बचाने की कोशिश की गई है अंत में इतना कहा जा सकता है कि सरकार को किसानों के लिए अदालत का भी विकल्प रखना चाहिए लेकिन इसके लिए विशेष अदालतें स्थापित की जानी चाहिए जो कि निश्चित अवधि में अपने फैसले जैसे कि इस कानून से किसानों को फायदा ही होगा नुकसान होने की कोई संभावना नहीं है। लेकिन सरकार का दायित्व बढ़ जाता है कि वह आंदोलनरत किसानों की शंकाओं को बैठकर बैठा कर वार्ता करें वह उनकी शंकाओं को तार्किक ढंग से आंदोलनरत किसानों को संतुष्ट करें जिससे पहले से ही करुणा के चलते टूट चुका आम जनमानस इस आंदोलन से होने वाले नुकसान से बच सके व अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को सुचारू रूप से चला सके।

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