सलीम रज़ा देश के नौनिहालों के लिए एक नई उम्मीद की किरण जागी है जिससे अब उनके कन्धे वजन से न तो थकेंगे और न ही उन मासूमों के माथे पर पसीना छलछलायेगा। दरअसल नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के मुताबिक अब पहली कक्षा से लेकर 10वीं कक्षा तक के छात्र-छात्राओं को उनके बस्ते का वजन शारीरिक वजन का 10 फीसद से ज्यादा नहीं होगा। केन्द्र की मोदी सरकार का नौनिहालों के हक में किया गया ये फैसला काबिले तारीफ है। इस फैसले से अब नौनिहालों को भारी बस्ते के बोझ से निजात मिल जायेगी। आपको बता दें कि ये मांग शिक्षाविदों और अभिभावकों के द्वारा कई सालों से सरकार से की जा रही थी, शिक्षाविदों के द्वारा समय-समय पर सरकार को नौनिहालों के मासूम कन्धों पर बस्ते के बोझ से होने वाले नुकसान को लेकर भी सुझाव दिये गये थे लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने इस तरफ कोई तवज्जो नहीं दी।
अब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पहली और दूसरी कक्षा के नौनिहालों के बस्ते का वजन ड़ेढ़ किलो से ज्यादा नहीं रहेगा तो वहीं तीसरी से पाचवीं तक के बच्चों के बस्ते का वजन तीन किलो तक का होगा, छठी और सातवीं के बच्चों के लिए बस्ते का वजन चार किलो सुनिश्चित किया गया है ,जिससे वे आसानी से अपने बस्ते उठा सकेंगे। यदि हम चिकित्सीय नजर से देखें तो ये बात कितनी दुःख देने वाली है कि बच्चों के बस्तों के बोझ ने बच्चों की ही मुस्कान छीन ली थी इस बोझ से उनकी बैक वोन तो कमजोर हो ही रही थीं साथ-साथ वे दीगर कई बीमारियों की जद में आ रहे थे। जरा आप सोचिए हर बच्चा तो सेहतमन्द नहीं होता बहुत से ऐसे बच्चे होते हैं जो जन्म से कुपोषण का शिकार होते हैं वे बस्तों का बोझ किस तरह उठाते होंगे ये तो उनके ही दिल से कोई पूछे।
नई शिक्षा नीति में सरकार ने डिजिटल व्यवस्था पर भी जोर दिया है तो वहीं इस नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में एक बहुत अच्छी बात सामने आई है कि अब बच्चों को ज्यादा गृहकार्य नहीं दिया जायेगा साथ-साथ स्कूल प्रबन्धकों को बच्चों के स्वास्थ की नियमित जांच के लिए डिजिटल मशीनें रखने के साथ स्वच्छ पेयजल व्यवस्था मुहैयया कराने को भी कहा गया है। अमूमन देखने में ये आता है कि ज्यादातर स्कूलों में बच्चों को स्वच्छ पीने का पानी उपलब्ध नहीं होता है और बच्चे दूषित पानी पीने के लिए मजबूर होते है जिससे उनको नई-नई बीमारीयों की जद में आ जाने की आंशंका बनी रहती है। मोदी सरकार ने इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से लेते हुये नई शिक्षा नीति में इसे जोड़ा है। अब सबसे बड़ी बात और एक अनसुलझे सवाल की तरह मन में कौंधती है कि स्कूल प्रबन्धन इन नये नियमों को सुचारू ढंग से लागू कर पाता है या कि नहीं ? ये एक चैलेन्ज से कम नहीं समझा जाना चाहिए। सरकार ने भी बच्चों के हक में फैसला पूर्व में शिक्षा नियमों पर किये गये रिसर्च अध्ययन के बाद स्कूली बच्चों के बस्ते का मानक भार के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय एजेन्सियों की सिफारिशों को सार्वभौमिक तौर पर अध्ययन करने के बाद ही ये फैसला लिया है।
अब देखना ये है कि निजी स्कूल कम्पटीशन के इस दौर में कहीं ऐसा न हो कि इस नई शिक्षा नीति को हवा में न उड़ा दें। ये बात सत्य है कि निजी स्कूल दिखावे की दौड़ और होड़ में स्कूल के बच्चों को उनकी क्षमता से ज्यादा होमवर्क दे देते हैं जिसकी वजह से बच्चों के स्कूली बस्ते का वजन बढ़ना स्वभाविक है, लेकिन इसके मुकाबले सरकारी स्कूल के बच्चों का वजन सीमित होता है। हम भी इस बात में फख््रा महसूस करते हैं कि हमारा बच्चा मंहगे निजी स्कूल में शिक्षा हासिल कर रहा है वे सरकारी स्कूल के बच्चों को एक अलग ही नज़र से देखता है तो निजी स्कूल भी अभिभावकों को रिझाने के लिए कुछ न कुछ एडिशनल सब्जेक्ट पढ़ने का बोझ जबादस्ती बच्चों पर डाल देते हैं जिससे स्वभाविक है कि बच्चे के बस्ते का वजन तो बढ़ेगा ही नतीजा ये होता है कि भारी-भरकम बस्ते के बोझ से बच्चों के शरीर पर दुष्प्रभाव पडना तो लीजिमी है ही परिणाम ये होता है कि बच्चा स्पांडलाईटिस,झुकी हुई कमर,पोस्चर और संास जैसी तकलीफों से ग्रसित हो जाता है, उसके उठने बैठने का ढंग भी मुतास्सिर होता है। कई ऐसे किस्से भी सुनने में आये कि बच्चा हार्ट अटैक से असमय मौत के काल ग्रास में समा गया दूसरी सबसे बड़ी बात ये है कि पढ़ाई और बस्ते के भार से बच्चा मानसिक दवाब में आ जाता है होता ये है कि बच्चा अवसाद जैसी भयानक बीमारी का शिकार हो जाता है।
एसोसियेटड चैंम्बर्स आफ कामर्स एंड इन्डस्ट्री आफ इन्डिया की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक स्तर के लगभग तीस से चालीस फीसद बच्चे कमर के दर्द के शिकार हो जाते हैं जिसकी वजह से उनके अन्दर पोस्चर जैसी बीमारी की समस्या का डर रहता है। सही बात कही जाये तो स्कूली बस्ते के बोझ और जरूरत से ज्यादा होमवर्क और उससे ज्यादा अभिाभवको का बच्चों की तरफ से अति महत्वाकांक्षी हो जाने से बच्चों का खिलखिलाता बचपन खोता जा रहा है। जरूरी है कि बच्चों को मानसिक रूप से आजाद रहने दिया जाये लेकिन निजी स्कूलों में ये प्रथा सी पड़ गई है कि बच्चों को इतना होमवर्क दिया जाता है कि बच्चा पांच से सात घंण्टे उस में अपना सिर खपाता है ऐसे में न वो खेल सकता है और न मौज-मस्ती कर सकता है और इस अतिरिक्त दवाब के चलते बच्चा मानसिक तनाव का शिकार हो जाता है।
बहरहाल इन सब बातों से निजात दिलाने के लिए केन्द्र सरकार ने नई शिक्षा नीति को लागू करने का फैसला किया है जिसकी हर कोई प्रशंसा कर रहा है, लेकिन कुछ निजी स्कूल हैं जिन्हें इससे एतराज है उनकी दलील है कि नई शिक्षा नीति के लागू होने से उनके शिक्षा के स्तर में गिरावट आयेगी लेकिन अब सभी स्कूलों को सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे स्कूल में टाईम-टेबल के अनुसार ही किताबें लायें । मेरा तो ये ही कहना था कि नई शिक्षा नीति सुनहरे भविष्य की कल्पना है बेहतर तो ये होगा कि बच्चों को ध्यान में रखकर सभी स्कूल इस नई शिक्षा नीति का स्वागत करें और इसे पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ अमल में लायें।
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