आत्माराम त्रिपाठी की✍

आज सियासत में किसे सही गलत समझा जाए मेरी समझ से देश हित को ही सबसे ऊपर रखा जाए। विरोध जताने के नाम पर आखिर कब तक भारत यूं ही बंद होता रहेगा 1970 से आज तक ना जाने कितने भारत बंद हुए ना जाने कितनी रैलियां निकली ना जाने कितने धरना प्रदर्शन हुए लेकिन क्या कभी एक भी बंद रैलियों प्रदर्शनों से सरकार ने फैसले बदलें हैं। भारत बंद के बावजूद सरकार किसानों से बात करने को तैयार है इससे साफ जाहिर होता है कि सारा मामला अभी अंधेरी सुरंग में नहीं पहुंचा है।सच्चाई तो यह है कि देश के 40 50 करोड़ किसानों की दशा अत्यंत दयनीय है उन्हें टेका लगाने में भाजपा सरकार ने कोई कमी नहीं रखी है उन्हें तरह-तरह के फायदे और सुविधाएं पिछले 6 साल में वह देती रही है।लेकिन आज भी हमारा किसान दुनिया के दर्जनों देशों के किसानों की तुलना में चार 6 गुना ज्यादा गरीबी में गुजारा करता है।समर्थन मूल्य पर सिर्फ 6% किसानों को ही मिलता है 94% किसान खुले बाजार में अपना माल बेचते हैं वर्तमान किसान आंदोलन की रीढ़ समर्थन मूल्य वाला मालदार किसान ही है वही सबसे ज्यादा घबराया हुआ है। यदि हम सभी किसानों की हालत सुधारना चाहते हैं तो भारतीय कृषि व्यवस्था को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाना बहुत जरूरी है।यदुवंश समर्थन मूल्य की सरकारी खरीद पर ही निर्भर रहेगी तो उसका पिछड़ापन हमेशा बरकरार ही रहेगा समर्थन मूल्य की नींद अभी कुछ वर्षों तक चलाए रखना जरूरी है लेकिन हमारे वह किसान आदर्श होने चाहिए जो खुले बाजार में अपनी उपज अनाज सब्जियां और फल बेचते हैं वह अवस्था में ज्यादा पैसा कमाते हैं कम जमीन कम पानी और कम खाद में अपनी फसलें उगाते हैं। भारत में अनाज और सब्जियों और फलों की पैदावार कई गुना बढ़ सकती है और भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य निर्यातक राष्ट्र बन सकता है ।सरकार की यह भूल तो हुई है उसने तीनों क्रषि कानून बनाने के पहले ना तो किसानों से उचित परामर्श किया और ना ही उन्हें उनके फायदे समझाए लेकिन अभी बीच का रास्ता निकालना मुश्किल नहीं है। भारत बंद के आवाहन पर पहले भी कई बार हुए हैं लेकिन किसानों की मांगों को लेकर यह भारत बंद शायद पहली बार घोषित हुआ है इस घोषणा पर कितना भारत बंद रहा इस पर लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है लेकिन यह तो स्पष्ट ही है कि भारत बंद तभी माना जाता है जब वह शहरों में दिखाई पड़े। गांव बंद है या खुला रहे उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता शहर जब सुनसान दिखाई पड़ते हैं और बाजार खाली रहते हैं तब बंद को सफल माना जाता है लेकिन किसानों का यह बंद अब राजनीति का फुटबॉल बनकर रह गया है देश के भाजपा शासित प्रांतों में इसे विफल और विरोधी प्रांतों में इसे सफल दिखाने की पूरी कोशिश की गई। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देश के वे राजनीतिक दल और नेता भी उन क्रश कानूनों का आंख मीच का विरोध कर रहे हैं जो कल तक उसी तरह के सुझाव दिया करते थे और अपने चुनावी घोषणा पत्रों में उसी तरह के कानून बनाने के उपाय दे किया करते थे इसका अर्थ यह नहीं कि ये तीनों प्लस कानून निरापद है और इनमें सुधार की गुंजाइश नहीं है इनमें सुधार की जरूरत निश्चय ही है लेकिन जो पार्टियां और नेता आज आंदोलन की बैलगाड़ी पर सवार होना चाह रहे हैं उन्होंने अपनी असली हैसियत को उजागर कर दिया है। इस किसान आंदोलन की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उसने राजनेताओं को अपने मंच पर बैठने की जगह नहीं थी लेकिन असर है कि जब 9 दिसंबर को फिर से सरकार और किसान नेताओं का सम्मान तय हो गया था तो 8 दिसंबर को भारत बंद का नारा क्यों दिया गया हो सकता है कि किसान नेताओं को कुछ विघ्न संतोषी राजनेता गुपचुप प्रेरित कर रहे हो या किसान नेता वार्ता के पहले सरकार पर दबाव बनाना चाहते हैं किसानों का यह आंदोलन इसलिए भी प्रशंसनीय हैं कि पूरे देश में उन्होंने कहीं भी तोड़फोड़ या हिंसा का सहारा नहीं लिया कुछ शहरों में जो हाथापाई और धक्का-मुक्की की घटनाएं घटी हैं वह भी प्रतिस्पर्धी राजनीतिक दलों के बीच घटी है इसी बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की नजरबंदी और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की गिरफ्तारी भी अनावश्यक प्रतीत होती है। हर बात इस भारत बंद की तो बंद असल में विरोध प्रदर्शन नहीं सियासी शख्स प्रदर्शन भी है इसमें राजनीति से ज्यादा भूगोल का बड़ी भूमिका होती है क्योंकि जिन के विरोध में बंद है उनकी सत्ता जिन राज्यों में होती है वह बंद कभी सफल होता ही नहीं है यही वजह है कि अगले दिन अखबारों में यही छपता है बंद का मिलाजुला असर गुजरात में जिस तरह मुख्यमंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर किसानों के बंद को गैरकानूनी बताया प्रदर्शन में शामिल होने वालों पर सख्त कार्रवाई के संकेत दिए वह यह साबित करते हैं कि भाजपा इसका राजनैतिक श्रेय किसी को लेने नहीं देना चाहती सरकार किसानों के आंदोलन को राजनीतिक प्रेरित बता रही है। अगर यह राजनीतिक प्रेरित है केंद्र के मंत्री क्यों किसानों से बातें कर रहे हैं क्यों उनके चक्कर काट रहे हैं दरअसल भाजपा किसानों के आंदोलन को राजनीतिक आंदोलन साबित करना चाहती है किसान पिछले 11 दिनों से सड़कों पर बैठे हैं ठंड की मार झेल रहे हैं जैसा कि कुछ अखबारों के जरिए जानकारी मिली कि कुछ किसान ठंड से काल कावलित भी हो गए हैं। ऐसे में सरकार का दायित्व और बढ़ जाता है कि वह जिनके लिए वह कानून लाई है अगर वह भी इससे सहमत नहीं है तो आखिर वह क्यों इस पर अड़ी हुई है। सरकार जनता के लिए होती है तो उसे जनता की सुनना भी चाहिए अपने फैसलों के खिलाफ होने वाले विरोध प्रदर्शनों को राजनीतिक चाले बताने की कोशिश अब बंद होनी चाहिए बेहतर हो केंद्र सरकार सोलन का रास्ता निकाले क्योंकि कोरोनावायरस पिछले 10 महीने से रूकी रफ्तार इन धारणा प्रदर्शनों बंद की भेंट नहीं चलना चाहिए देश को अब पुरानी रफ्तार पकड़ना है उसे फिर से दौड़ना है तो देश की राजधानी में बंद पड़े रास्ते खोलने होंगे बंद की राजनीति से देश को मुक्त होना होगा संविधान ने विरोध का अधिकार दिया है लेकिन विरोध में पूरे देश को ठप कर देना उचित नहीं है। इसके बिपरीत सरकार को भी अपनी हठधर्मिता को छोड़कर किसानों की समास्या को उनकी समास्याओं को उनके चिंता,शंका को दूर करने के लिए आगे आना चाहिए नकी विरोधाभासी बयान देकर किसानों के शक को दूर करने के बजाय उसे मजबूती प्रदान करना चाहिए।आज अगर किसान इस स्थिति में पहुंचा है तो उसके लिए जिम्मेदार भी सरकार ही है।

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