आत्माराम त्रिपाठी की✍🏻 से किसान यानी अन्नदाता धरतीपुत्र देश की रीढ़ जीवचराचर का अपनी मेहनत से सरदर्दी गर्मी के थपेड़ो को झेलते हुए सबका भरण-पोषण करने वाला और आज वही सबसे ज्यादा उपेक्षित आखिर क्यों? आखिर उसके धैर्य संयम को क्यों हमेशा चुनौती दी जाती है ?क्यों बिवस कर दिया जाता है कि वह खेत से सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाता है।हम उस नारे की गंभीरता को क्यों भूल जाते हैं ?जय जवान जय किसान जो जन जन की आवाज बन चुका था क्या यह मात्र नारा है उद्घोष करने के लिए य फिर यह नारा यह नहीं सिध्द करता की इस नारा को असली जामा पहनाए बिना जीवन जीवन की सुरक्षा उसके बिकास की परिकल्पना करना भी मुश्किल ही नहीं असंभव है। आज देश के कोने कोने से किसान दिल्ली की ओर कूच कर रहा है उस कूच करने वालो में किसान नहीं है वह देश की आत्मा है जो बेचैन है और उसे लगता है कि दिल्ली में उसे न्याय मिलेगा पर न्याय की जगह उनके सामने जगह जगह अवरोध पैदा किए जा रहे हैं रास्ते दुर्गम बनाए ज रहे हैं। और नारा दिया जा रहा है जय जवान जय किसान का यानी इनके बिना देश के अस्तित्व की कल्पना करना भी बेइमानी है फरेब है। देश का किसान और तेजी से आगे बढ़े उसके पहले उन्हें सुने उनकी शंका समास्याओं का ठोस तरीके से निवारण करें उन्हें शब्दों के मकड़जाल में उलझाने के बजाए उनकी चिंताओं का निवारण करना अब दिल्ली का धर्म भी है और नैतिक कर्तव्य भी।तभी जय जवान जय किसान के नाम से लगाने वाले नारे की सार्थकता सिद्ध होगी। नहीं इस देश में तो प्याज लहसुन परिवर्तन ला देती है फिर यह तो अन्नदाता धरतीपुत्र से जुड़ी हुई समास्या है।
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