मैं अशिष्टता, उग्रता और मौखिक हिंसा का कतई पक्षधर नही हूँ। यदि कोई ऐसा दुराचरण करता है तो उसके प्रति सहानुभूति स्वतः समाप्त हो जाती है। यदि कोई समाचार पत्र अथवा चैनेल अथवा एंकर किसी पार्टी विशेष का नेता नही है अथवा उसका चैनेल किसी पार्टी के नेता की साझेदारी अथवा स्वामित्व में नही है, तब एक विशुद्ध उद्योगपति पत्रकार के रूप में यदि आज वह अपने राज्य के मुख्यमंत्री से अभद्रता कर सकता है तो कल सत्ता बदलने पर वह पूर्व की केंद्र सरकार के लिये भी आपत्तिजनक शब्दो का इस्तेमाल कर सकता है। भाजपा समर्थित मित्र जिस तरह अर्णव गोस्वामी का पक्ष ले रहे हैं वे यह भूल रहे है कि कल जब आप सत्ता में नही होंगे तब विज्ञापन और सुविधाओं के लोभ में यह आपको भी उसी तरह से दहाड़ते हुए अपने स्टूडियो में बुलाएंगे जिस तरह आज महाराष्ट्र सरकार को बुलाया है। भविष्य में पत्रकारिता के गिरते स्तर को सम्हालने, एक नई विधा प्रचलन में आने से रोकने के लिए उपरोक्त बिंदुओं पर विचार करना आवश्यक है। चौथे स्तंभ की गरिमा को रसातल में ले जाने का आचरण सभ्य समाज व दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र मे स्वीकार्य नही है। आप राज्य के मुख्यमंत्री को उनका नाम लेकर अपने स्टूडियो में आपसे आंख मिलाकर डिबेट करने की चुनौती दे रहे थे जो कि प्रत्येक सत्ता दल की प्रतिस्ठा और राजनैतिक करियर का प्रश्न स्वतः ही बन जाता है। यहां पत्रकार के आचरण को भाजपाई या कांग्रेसी बनकर देखना उचित नही है बल्कि ऐसा करना एकपक्षीय होगा। देश मे आजादी का संघर्ष कर क्रांति लाने वाला यह क्षेत्र यदि राज्य के मुख्यमंत्रियों और देश के प्रधानमंत्री के लिए ही अभद्र भाषा और चुनौतीपूर्ण शैली में समायोजित होने लगता है तो इसकी प्रतिस्ठा बचना और इनके आचरण को मर्यादित करना सरकारों का कर्तव्य हो जाता है। सत्ता दल में लाख कमियां ही क्यों ना हो किन्तु अपनी बात को विनम्रतापूर्वक पूरे शिष्टाचार के साथ रखना चाहिए। शीघ्र उफनना नही चाहिये। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है किंतु लोगो की गरिमा नष्ट करने, उनसे अभद्रता करने की स्वतंत्रता नही है। जब देश के बड़े बैनर के पत्रकार और न्यूज़ एंकर ही नेताओ के लिए ऐसी आभद्रा भाषाशैली का इस्तेमाल करेंगे तो आम आदमी को क्या सन्देश जाएगा यह सोचने वाली बात है। जहां तक २०१८ आत्महत्या प्रकरण में क्लोजर रिपोर्ट लगाकर बन्द होने के बाद आज पुनः खोलने के तर्क दिए जा रहे है, इस संदर्भ में मेरा मानना है कि यदि किन्ही कारणों से पीड़ित पक्ष को न्याय नही मिल सका है, चाहे वह धन बल के कारण हो अथवा राजनैतिक बल के कारण, प्रत्येक दशाओ में न्याय दिलाने का दायित्व अंतिम रूप से राज्य पर होता है। यदि परिवार अथवा सरकार विवेचना व न्याय से संतुष्ट नही है तो सरकारों से न्याय दिलाने हेतु कार्यवाही की अपेक्षा की जा सकती है। खासकर तब यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब सम्बन्धित प्रकरण हत्या अथवा आत्महत्या का हो। एक विधवा पत्नी के स्थान पर बैठकर उसकी पीड़ा विचार योग्य है। क्लोजर लग जाने को अंतिम न्याय मान लेना कोई एक्सक्यूज नही है। विभिन्न पत्रकार संगठन और एडिटर गिल्ड एक आरोपी के साथ शिष्टाचारपूर्ण रवैये का अनुरोध करते हुए उसे हिरासत में लिए जाने की निंदा कैसे कर रहा है यह बात मेरी समझ से परे हैं? अगर आप एक पत्रकार है तो क्या आपको कुछ भी करने की छूट दे दी जानी चाहिए? या आपके साथ आरोपियों जैसा बर्ताव नही किया जाना चाहिए? पत्रकार के अपराधों पर पर्दा डालना और उन्हें संरक्षण देना ही क्या आपका उद्देश्य है? यदि इसका उत्तर हां है, तो कृपया संविधान में संशोधन करते हुए पत्रकारों को समस्त प्रकार के अपराधों से छूट दिए जाने और उनका स्थान कानून व न्यायपालिका से भी ऊपर किये जाने हेतु सरकारों से अनुरोध क्यों नही करते? शेष आप मित्रगण स्वतः समझदार हैं। देश मे न्यायपालिका जब तक जीवित है, तभी तक न्याय जीवित है, यह बात हम सभी को याद रखनी चाहिये। स्वतंत्र लेखक-निखिलेश मिश्रा

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