![]कथा वाचक डॉ धर्मेंद्र कुमार

एक एक कष्टदायक समय को मैंने गुजारा है बहुत प्रयत्न के समय विताया ,बहुत.प्रयास और कोशिश करता थाकि पीपल वृक्ष में प्रवेश कर जाऊ ,बहुत तरीका अपनाया , कई उपाय किया उसमें प्रवेश करने को, बहुत अंधकार भरी जीवन था, अंततः लगातार प्रयास से एक ऐसा क्षण आया कि उसमें प्रवेश पाया ,इससे मेरा शरीर बिल्कुल शुद्ध होने लगा ।मैं प्रवेश कर रहा हूँ ।यह बात विश्वास और आग्रह कै साथ कह सकता हूँ कि यदि इस पीपल वृक्ष पर प्रयोग किया जाये तो निश्चित है आपका शरीर स्वतः शुद्ध होने का कंपन महसूस करेगा ? उस वक्त मेरे लिये पीपल का …..प्राप्त करना बहुत बडा दुःख लग रहा था और अब वैसा कोई दुःख मेरे भीतर नहीं दिखाई देता है चारो ओर पीपल ही पीपल दिखायी देता है। यह क्षणचिर स्मरणीय है।अब नये दुःख का प्रवेश मेरे अंदर प्रारंम्भ हो रहा है, वह मेरा अपना दुःख नहीं है। फिर मेरा मन आन्दोलित रहता है, चिंतनशील रहता है। वह जब अपने इर्द-गिर्द लोगों को देखता हूँ तो बहुत मन मे पिडा होती है आखिर वह व्यक्ति जिनको पीडा है वह हल कर सकता है।आसान तरीका है, वह सतत् पीपल वृक्ष को समर्पण कर दे तो उसे तुरंत दुःख से छुटकारा मिल सकता है पर वह ऐसाकर नहीं कर पाता हैउसके चितंन मे गहराई नहीं है, कोई चितंन ही नहीं है आखिर पीपल वृक्ष की जीवंत पहलुओं पर विचार नहीं कर पता है। जो व्यक्ति चाहे -अनचाहे मन से चितंन करेगा पीपल के संबंध में थोडा सा ही चिंतन करेगा तो उसके अन्दर कंपन महसूस होने लगेगा ,यह निरभर करता है व्यक्ति के चिंतन पर कि वह स्वयं को कैसा बनना चाहता है। चितंन के प्रति ,मतलब अनेकों विदृनो एवं मनीषियों ने  कई कथा में कहा है लेकिन इन सबसे अलग चितंन का मतलब जो चारो तरफ घटित हो रहा है उसके प्रति सोचे । चितंन का सही उदाहरण गौतम बुद्ध मानो गयो  है क्योंकि गौतम बुद्ध के प्रति उनके पिता ने  ऐसा  उपाय व्यवस्था किया कि बुद्ध को कोई नकारात्मक ऊर्जा का चितंन पैदा न हो । इस प्रसंग में एक दिन गौतम बुद्ध महल  छोड निकलकर गाँव की ओर  किसी प्रयोजन से रथ से जा रहे थे कि अचानक उन्होंने देखा एक बुढा आदमी चला आ रहा है, सारथी से पूछा -ईस आदमी को क्या हो गया हैं? सारथी ने कहा सच यह है कि प्रत्येक आदमी का अंत ऐसा ही होता है?गौतम तुरंत जानना चाहा की मैं भी? सारथी ने कहा कोई भी अपवाद नहीं है? गौतम ने कहा वापस लौट चलो-मैं बूढा हो गया ?यानी ऐसा हो ही जाना है तो बात समाप्त हुईं ।इसे चितंन कहा गया । गौतम जब आगे बढे तो देखा कुछ आदमी एक  अर्थी को लिये जा रहा था और लोग  विलाप कर रहा था तब उसने सारथी से पुछा यह क्या है? यह सत्य है , ो गया है ,जलाने ले जा रहे हैं? उनको पहली दफा चितंन आया जीवन  नष्ट  हो जाता है,और वोले वापस चलो मैं मर गया हूँ? इसको भी चितंन कहते हैं? परम सत्य को जानने के लिये जरूरी है। पीपल वृक्ष की तरह  शुद्ध होना ,जब तक शरीर शुद्ध नहीं होता मानो सभी क्रियाएँ नकरात्मक ऊर्जा से प्रवाहित रही है। शरीर एक साधन है, साधना के लिए ,ध्यान के लिए सकरात्मक ऊर्जा होना चाहिए ।शरीर तो सिर्फ एक साधन है, इसको जिस ओर प्रवाह करें ,इसका शुद्धि तो पीपल के सानिध्य में ही हो पायेगा जब आपकी समस्त चितंन पीपल वृक्षों के परिधि मे देख पायेगा ।आपने पीपल वृक्षों को भी गौर से नहीं पाये ,महसूस नहीं, कर पाये उसका तना ,जड,टहनियों और पते विलकुल मूर्ति जैसा प्रतीत होता है, एकदम शांत ,स्थिर ,कोई कंपन नहीं। आप कभी पत्थर का कोई मूर्ति देखें ,गौर करे तो  एकदम  शांत ,अगर वह आदमी के रूप मे पीपल नीम तुलसी अभियान

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