आखिर नारी जाति को ही इतनी पीड़ा अग्निपरीक्षा के दौर से क्यों गुजरना पड़ता है ?उसका दोष क्या है? क्या नारी होना नारी के लिए अभिशाप बन गया है ? एक तरफ सकल विश्व समुदाय नारी में मां का रूप देखता है उसकी पूजा अर्चना करता है और यह युगों युगों से करता चला आ रहा है।जिसे सब देखते हैं और स्वीकार भी करते हैं उसका उदाहरण नवदुर्गा उत्सव में नवदुर्गाओं की पूजा अर्चना करना।जो सदियों से चली आ रही है।जिसे देव दानव सुर असुर नर किन्नर सभी मनाते य मानते हुए चले आ रहे हैं।पर इस स्वरूप को हम आत्मसात कर पाएं हैं ?क्या इस स्वरूप के लाज की रक्षा करने में सफलता प्राप्त कर ली है? इसी मां का स्वरूप है बहिन, बेटी, पत्नी तो क्या आज का सभ्य समाज कहे य असभ्य इन तीनों स्वरूपों के प्रति न्याय कर सका मुझे तो लगता है कि नहीं।इसका कारण हम अपने अन्दर छिपे हुए रावण दुर्योधन दुशासन को नहीं मार सके बल्कि उन्हें अपने अंदर पालते पोषते रहे जो आज ज्वाला मुखी बन फटकर हमारी संस्कृति हमारी सभ्यता को जलाकर राख कर देने में आमादा है।आज स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि लोगों की तिरछी नजरों को देखते ही अपनी भाग्यवान से कहने को बिबस हो जाता है कि जाओ बेटी को छिपाओ बेटी जब तक कालेज विद्यालयों से वापस सकुशल नही आ जाती माता पिता चिंता ग्रस्त रहते हैं।उनकी बहन बेटी सकुशल वंहा होगी भी या नहीं।अब बारी आती है पत्नी की जो पहले एक बेटी किसी की बहन होती है बाद वही बहू बनती है जिसका सर्ब प्रथम ससुराल में स्वागत होता है हमारे घर लक्ष्मी आई कहकर के मंगल गीतों के मधुर संगीत स्वरो के साथ आरती उतारते हुए ग्रह प्रवेश कराया जाता है।पर विडंबना देखिए इस सभ्य समाज की उसी लक्ष्मी का किस तरह अनादर तिरस्कार किया जाता है जो अपने माता-पिता सहेली अपनी संस्कृति यहां तक अपना जन्माइसी गोत्र अपने माता-पिता द्वारा लगाए गए अपने नाम तक का त्याग कर देती है और अपने चेहरे में शिकन तक नहीं आने देती साथ स्वीकार करती है आपकी संस्क्रति और बन जाती है आपके बंशबेल को आगे बढ़ाने की पत्नी से पूज्यनीय मां पर यह समाज उसे क्या देता है उसके स्वरूपों के साथ कैसा सलूक व्यवहार करता है की लिखने में लेखनी के सब्द भी कम पड़ रहें हैं। लेखनी कंपकंपा रही है आज की दरिंदगी कामुकता भरी हैवानियत दूषित निगाहें जो चीर हरण कर रही है। और हम कह रहे हैं कि हम वीसवी सदी के विकास सील देश के विकसित सभ्य समाज के लोग हैं ।तो हम असभ्य समाज किसे कहें किसे बताएं कि अविकसित लोग कैसे होंगे व कैसे रहें होंगे फैसला हमारे सुधी पाठकों के हाथ।
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